Monday, September 14, 2009

अश्लील मूर्तियाँ/चित्र मंदिर मैं क्यूँ ? Why sexual statue or carvings in Hindu Temple?

हमारे कई मंदिरों मैं अश्लील मूर्तियाँ/चित्र मंदिर के प्रवेश द्वार या बाहरी दीवारों पर अंकित होती हैं | तिरुपति मं भी बिलकुल मुख्य द्वार के ऊपर मिथुन भाव की अंकित मूर्ती देखा तो सहज ही ये प्रश्न दिमाग मैं आया की आखिर हमारे देवालयों मैं अश्लील मूर्तियाँ/चित्र क्यों होते हैं? इधर-उधर बहुत छाना पर इसका वास्तविक और और सही उत्तर मिला मुझे महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र में | वैसे तो बाजार में कामसूत्र पर सैकडों पुस्तक उपलब्ध हैं और लगभग सभी पुस्तकों में ढेर सारे लुभावने आसन चित्र भी मिलेंगे | पर उन पुस्तकों में कामसूत्र का वास्तविक तत्व गायब है | फिर ज्यादातर पाठक कामसूत्र को ६४ आसन के लिए ही तो खरीदता है, तो इसी हिसाब से लेखक भी आसन को खूब लुभावने चित्रों के साहरे पेश करता है | पर मुझे ऐसी कामसूत्र की पुस्तक हाथ लगी जिसमे एक भी चित्र नहीं है और इसे कामसूत्र की शायद सबसे प्रमाणिक पुस्तक मानी जाती है | महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र के श्लोक थोड़े क्लिष्ट हैं, उनको सरल करने हेतु कई भारतीय विद्वानों ने इसपे टिका लिखी | पर सबसे प्रमाणिक टिका का सौभाग्य मंगला टिका को प्राप्त हुआ | और इस हिंदी पुस्तक में लेखक ने मंगला टिका के आधार पर व्याख्या की है | लेखक ने और भी अन्य विद्वानों की टीकाओं का भी सुन्दर समावेश किया है इस पुस्तक में |


एक गृहस्थ के जीवन में संपूर्ण तृप्ति के बाद ही मोक्ष की कामना उत्पन्न होती है | संपूर्ण तृप्ति और उसके बाद मोक्ष, यही दो हमारे जीवन के लक्ष्य के सोपान हैं | कोणार्क, पूरी, खजुराहो, तिरुपति आदि के देवालयों मैं मिथुन मूर्तियों का अंकन मानव जीवन के लक्ष्य का प्रथम सोपान है | इसलिए इसे मंदिर के बहिर्द्वार पर ही अंकित/प्रतिष्ठित किया जाता है | द्वितीय सोपान मोक्ष की प्रतिष्ठा देव प्रतिमा के रूप मैं मंदिर के अंतर भाग मैं की जाती है | प्रवेश द्वार और देव प्रतिमा के मध्य जगमोहन बना रहता है, ये मोक्ष की छाया प्रतिक है | मंदिर के बाहरी द्वार या दीवारों पर उत्कीर्ण इन्द्रिय रस युक्त मिथुन मूर्तियाँ देव दर्शनार्थी को आनंद की अनुभूतियों को आत्मसात कर जीवन की प्रथम सीढ़ी - काम तृप्ति - को पार करने का संकेत कराती है | ये मिथुन मूर्तियाँ दर्शनार्थी को ये स्मरण कराती है की जिस व्यक्ती ने जीवन के इस प्रथम सोपान ( काम तृप्ति ) को पार नहीं किया है, वो देव दर्शन - मोक्ष के द्वितीय सोपान पर पैर रखने का अधिकारी नहीं | दुसरे शब्दों मैं कहें तो देवालयों मैं मिथुन मूर्तियाँ मंदिर मैं प्रवेश करने से पहले दर्शनार्थीयों से एक प्रश्न पूछती हैं - "क्या तुमने काम पे विजय पा लिया?" उत्तर यदि नहीं है, तो तुम सामने रखे मोक्ष ( देव प्रतिमा ) को पाने के अधिकारी नहीं हो | ये मनुष्य को हमेशा इश्वर या मोक्ष को प्राप्ति के लिए काम से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है |


मंदिर मैं अश्लील भावों की मूर्तियाँ भौतिक सुख, भौतिक कुंठाओं और घिर्णास्पद अश्लील वातावरण मैं भी आशायुक्त आनंदमय लक्ष्य प्रस्तुत करती है | भारतीय कला का यह उद्देश्य समस्त विश्व के कला आदर्शों , उद्देश्यों एवं व्याख्या मानदंड से भिन्न और मौलिक है |


प्रश्न किया जा सकता है की मिथुन चित्र जैसे अश्लील , अशिव तत्वों के स्थान पर अन्य प्रतिक प्रस्तुत किये जा सकते थे/हैं ? - ये समझना नितांत भ्रम है की मिथुन मूर्तियाँ , मान्मथ भाव अशिव परक हैं | वस्तुतः शिवम् और सत्यम की साधना के ये सर्वोताम माध्यम हैं | हमारी संस्कृति और हमारा वाड्मय इसे परम तत्व मान कर इसकी साधना के लिए युग-युगांतर से हमें प्रेरित करता आ रहा है –


मैथुनंग परमं तत्वं सृष्टी स्थित्यंत कारणम्
मैथुनात जायते सिद्धिब्रह्म्ज्ञान सदुर्लाभम |


देव मंदिरों के कमनीय कला प्रस्तरों मैं हम एक ओर जीवन की सच्ची व्याख्या और उच्च कोटि की कला का निर्देशन तो दूसरी ओर पुरुष प्रकृति के मिलन की आध्यात्मिक व्याख्या पाते हैं | इन कला मूर्तियों मैं हमारे जीवन की व्याख्या शिवम् है , कला की कमनीय अभिव्यक्ती सुन्दरम है , रस्यमय मान्मथ भाव सत्यम है | इन्ही भावों को दृष्टिगत रखते हुए महर्षि वात्सयायन मैथुन क्रिया, मान्मथ क्रिया या आसन ना कह कर इसे 'योग' कहा है |

18 comments:

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

You are going in right way. May God bless you. Good article.

जी.के. अवधिया said...

राकेश जी, बहुत अच्छा विश्लेषण किया है आपने!

मन्दिरों के ये भित्तिचित्र एक और संदेश देती हैं, वह यह कि भक्ति में लीन होने और मोक्षप्राप्ति के प्रयास करने के पूर्व वंशवृद्धि करना भी तुम्हारा अत्यावश्यक कर्तव्य है।

Pankaj Mishra said...

राकेश भाई नमस्कार !
आपने तो गजब की बात बता दिया कि प्रथम सोपान पार करने वाला ही योग्य है देव प्राप्ती का .
आभार , सहमत हु आपसे !

Mithilesh dubey said...

राकेश जी आपने जो मुद्दा उठाया है वह बहुत ही जटील है। इसका सही जवाब जान पाना मुश्किल होगा। लेकिन हाँ इतना जरुर कहना चाहुंगा कि जो भी होगा उसके पिछे कोई न कोई सार्थक कारण ही होगा। सुन्दर आलेख.....

दिगम्बर नासवा said...

अच्छा vishleshan है ........ rochak पर ये एक bahas है जो khul कर honi चाहिए हमारे SAMAAJ में ..........

jayram " viplav " said...

सर , एक ब्लॉग बनाया है "sex aur society" जहाँ सेक्स अर्थात काम का जीवन में योगदान और समाज पर होने वाले प्रभावों की चर्चा करने का लक्ष्य बनाया है . इसमें मौलिक विचारों के अलावा बड़े विचारकों के बातों को भी पेश किया जायेगा . इस ब्लॉग पर परिचयात्मक पोस्ट के बाद सबसे पहली पोस्ट के रूप में आपके इस आलेख को लगा रहा हूँ . देखिएगा :www.sexaursociety.blogspot.com

Atmaram Sharma said...

राकेश जी, विषय गूढ है, किन्तु आपने बढ़िया व्याख्या की है.

हर्षवर्धन said...

बढ़िया सवाल उठाया है। लेकिन, ब्रह्मचारियों, ऋषियों, साधु-संतों के लिए इसमें क्या जवाब निकलेगा।

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

कुछ लोग सठियाई हुई टिपण्णी क्यूँ करते हैं... इस पर भी टिपण्णी करनी चाहिए

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

@ अवधिया जी आपने ठीक कहा है | गृहस्थों के लिए संतान उत्पत्ति जरुरी है |
@ मिथिलेश, इसका सही जवाब तो शाश्त्रों को पढने से ही मिलेगा | कामसूत्र एक शास्त्र है जिसमे इसका वर्णन है और मैंने वही लिखा है | और भी एक-दो साश्त्रों की व्याख्या भी कामसूत्र से मिलते जुलते ही हैं |
@हर्षवर्धन जी, ब्रह्मचारी , ऋषि, साधु-संत (मैं वास्तविक साधु-संतों की बात कर रहा हूँ, ठोंगीयों की नहीं) तो बनते ही इसलिए हैं की उन्हें काम पर पूर्ण विजय पाना है | ब्रह्मचारियों, ऋषियों, साधु-संतों से भी अश्लील मूर्तियाँ और भित्तिचित्र यही सवाल करती है - अश्लील मूर्तियाँ देखकर भी तुम्हारा ध्यान आध्यात्म और इश्वर मैं ही लगा है ना ? योग-साधना, भक्ती, वैराग्य आदि से तुमने काम पे विजय प्राप्त किया है या नहीं ? यदि नहीं तो तुम भी मोक्ष के अधिकारी नहीं हो |
@जयराम जी धन्यवाद की आपने मेरा पोस्ट वहां लगाया ... पर मेरे ब्लॉग का लिंक भी वहां डाल देते तो बढिया रहता |
पंकज जी, दिगंबर जी, आत्माराम जी - समय निकाल कर टिप्पणी की धन्यवाद आपका |

दर्पण साह "दर्शन" said...

Blogjagat abhi itna bold nahi hua aur sath hi mere kuch rishtey blogjagat main ghoomte rehte hai isliye vistaar se tippani to nahi kar paaonga...

shayad kabhi mail ke through samjha paaon apne vichar.

haan magar post acchi thi...

...ek sartakh behas avashayak hai....

...sehmati, asehmati 'secondary' hain.

Anil Pusadkar said...

बहुत सही विश्लेषण।मोक्ष और सन्यास की ओर भागते जनमानस को उसका पारिवारिक दायित्व गृहस्थ जीवन का ध्यान दिलाने का अद्भूत प्रयास था वो।

Vivek Rastogi said...

सटीक आलेख,

रंजना said...

वस्तुतः आपका आलेख और प्रत्युत्तर में की गयी टिपण्णी मिलकर एक पूरी पोस्ट बनी है...मेरा सुझाव है की टिपण्णी को भी पोस्ट का हिस्सा बना कर दुबारा पोस्ट कर दें....

किन शब्दों में आपका साधुवाद आभार और प्रशंशा करूँ ,समझ नहीं पा रही....

इतना सटीक सारगर्भित विश्लेषण आपने प्रस्तुत किया है कि मन से आपके लिए शुभाशीष स्वतः ही निकल गया....

बहुत बहुत सुन्दर विवेचना...मुझे केवल यह समझ नहीं आ रहा कि लोगों को इसमें संदेहजनक क्या लग रहा है....जबकि सत्य तो केवल और केवल यही है...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सही विश्लेष्ण किया है आपने ..हर बात के पीछे कोई न कोई कारण जरूर होता है ..और आपने मोक्ष के सही अर्थ को यहाँ दे दिया ..पुरी, कोणार्क आदि अनेक मंदिरों की मूर्तियाँ सुन्दर अध्यात्मिक भाव ही दिल में पैदा करती है ..

Anonymous said...

बहुत अच्‍छा लिखा, धन्‍यवाद

Anonymous said...

you have very honestly justified the answer & given a meaningful thought to every one. Keep it up & God Bless you.

PramodNihore@yahoo.com

Rupesh Rathore said...

Mai kal hi KHAJURAHO MAI THA AUR YE HI PRASHN DIMAG ME KONDH RAHA THA KI SHIV AUR VISHNU JAISE DEVTAO KE SAMMUKH is tarah ki KAMUK Murtiyo ka kya sambahndh....I agree with the depiction given by you...rupesh rathore indore