Wednesday, July 1, 2009

साउथ इंडियन - नॉर्थ इंडियन भगवान्

अमेरका मैं मुझे ये अहसास हुआ की हिन्दू पृथ्वी के किसी कोने मैं चले जाएँ, अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारन  संगठित नहीं रह सकते | बात यहाँ तक पहुँच गई की भगवान् को भी विभाजीत करने पे तुल गए| मुख्या धारा के ज्यादातर मंदिरों मैं यहाँ साउथ इंडियन - नॉर्थ इंडियन भगवान् मैं फासला आम बात है | मंदिरों मैं साउथ इंडियन - नॉर्थ इंडियन भगवान् की मूर्ति स्थापित करने के लिए मुहम चलते हैं, ताज्जुब तो तब होता है जब मंदिर ये पूछता है की आप किस भगवान् की मूर्ती के लिए दान दे रहे है ? और दान देने वाला भी इस सर्त पे ही दान देता की उसके दान का पैसे उसके भगवान् की मूर्ती पे ही लगेगा | फलां भगवान् जी आगे बढ़ गए हैं, फलां जी पीछे रह गए बोल कर मंदिर प्रसाशन इसमें कम्पितीसन भी करवाता है | नौबत तो यहाँ तक पहुंची की सरे नॉर्थ इंडियन मंदिर के बाहर टेंट मैं भजन कीर्तन कर रहे हैं और सभी साउथ इंडियन मंदिर के गर्भ गृह मैं अपने भगवन की आराधना मैं लगे रहे | लगता है भगवान् वेंकटेश्वर या अयाप्पन स्वामी ने अपने भक्तों को स्वप्न मैं आदेश दिया की जाओ और जा कर श्री राम, कृष्ण या बजरंग बलि के भक्तों से प्रतियोगिता करो और उन्हें अपना विरोधी मानो | 

2 comments:

'अदा' said...

हिंदुत्व का विस्तार नहीं होने का सबसे बड़ा कारण भी यही है, कहीं नार्थ-साऊथ, कहीं गुजरात-पंजाब, बे-शक यह विभाजन छोभ देता है लेकिन शायद यही विविधता भारत की पहचान है, इतना रंगीन राष्ट्र और कौन है भला, यहाँ अमेरिका-कनाडा में क्या है, सब कुछ इतना परफेक्ट है की उठा-पटक के लिए तरस जाते हैं, ना तो बिजली जाती है न पानी, ना लोग लड़ते हैं ना, शादी की धूम, ना होली की हुड-दंग, सब कुछ बस PERFECT. आप परेशान ना हों यहाँ की बोरिंग ज़िन्दगी से उकता कर भगवान् कब के भाग चुके होंगे, इसलिए साऊथ इंडियन जितनी मर्जी गर्भ गृह में अपने आप की स्थापित करना चाहे कर सकते हैं, वैसे भी हम नार्थ-इंडियन में इतनी एकता है कहाँ, जो हम भगवान् को मना कर यहाँ ला सकें...

जगदीश त्रिपाठी said...

रोना तो इसी बात का है बंधु। अन्यथा हर दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी हमारी हालत सदियों से ऐसी क्यों होती।