Monday, July 20, 2009

हिन्दी और लड़ाई (भाग - २)

हिन्दी और लड़ाई 

भाग - २
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अहिन्दी भाषी क्षेत्रों मैं लोगों ने कभी हिन्दी को अपनाया ही नहीं, हिन्दी के साथ सौतेला से भी बुरा व्यवहार होता रहा है | इन लोगों ने सदा अंगरेजी को अपना माना और हिन्दी को  दुत्कारा | इसपे भी तर्क देकर कहते हैं की हिन्दी यदि आएगी तो उनकी क्षेत्रीय भाषा ख़तम हो जायेगी | थोडा गहराई में जाएँ तो पता चलता है की आम तौर पे अहिन्दी भाषी लोग हिन्दी भाषी लोगों से लगभग नफरत सा करते हैं (और इनके पीछे भी कई चीजें हैं कभी विस्तार से चर्चा करेंगे इस पे) | अब जब अंगरेजी इनकी क्षेत्रीय भाषाओँ को धीरे-धीरे निगलने लगी है, तब कहीं जाकर ये नींद से जागे भर हैं | अंगरेजी मैं 'SIGN BOARDS'  आदी पे कालिख पोतने लगे हैं और ऑटो वाले, बस वाले आदी को फरमान भी जारी कर रहे की यदि कोई हिंदी मैं बोले तो जवाब मत दो | मेरा तो उनसे यही कहना है बंधू अब देर हो चुकी है और अब तो अंगरेजी वाली अजगर आपके रोके ना रुकेगी | यदी अहिन्दी भाषी लोग हिन्दी को बड़ी बहिन मान कर अपना लेते तो आज ये नौबत नहीं आती | हिन्दी रहती तो क्षेत्रीय भाषाओँ का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता था | हिन्दी का इतिहास देखें इसने कभी किसी पे रौब-धौंस नहीं जमाई,  इसने तो क्षेत्रीय भाषाओँ को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है |

किसी भी राष्ट्र को एक सूत्र मैं बांधे रखने मैं भाषा का महत्वपूर्ण योगदान होता है | अंगरेजी के अंध भक्त भी इसपे राजी होंगे की इसमें अपनापन नहीं और इसमें भारत को जोड़ कर रखने की शक्ती नहीं | हिन्दी की दुर्दशा का कारण हमारी सरकार और बजारवाद के साथ साथ हम भी हैं | यहूदियों को देखें, पुरी दुनियाँ मैं ये लोग खुद या एक ग्रुप बनाकर अपने बच्चे को बचपन मैं ही हिब्रू सिखाते ही नहीं वरण इसके प्रती प्रेम की भावना भी जगा देते हैं | भारत के बाहर भी, जहाँ अपने देश (भारत) की अपेक्षा अपने सभ्यता-संस्कृति को लेकर ज्यादा सजगता-उत्साह हैं, बच्चों की हिन्दी अनिवार्यता को गंभीरता से नहीं लिया जाता | अपने देश मैं तो इसपे एक मुहावरा सा बन गया है "हिन्दी की 'MARKET VALUE' नहीं है, इसे पढ़-लिख के क्या मिलेगा?" | वैसे सोंचे तो अपनी माँ की भी  'MARKET VALUE' नहीं होती, तो क्या उसकी भी सेवा बंद कर दी जाए | हिन्दी आज भी अपने ही बेटों के आगे याचना कर रही है "कभी तो नफ़ा-नुकसान से परे हट कर, माँ समझ कर सेवा करो" | हिन्दी को सिर्फ एक भाषा समझने की भूल ना की जाए, ये  तो भारत की प्राण वायु है | हिन्दी बिना भारत निष्प्राण और जड़ भर रह जाएगा |

अंगरेजी पढ़ी के जदपि, सब गुण होत प्रवीण
पर निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन |  - भारतेंदु हरिश्चंद्र 

निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल 
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत ना हिय के शूल |  - भारतेंदु हरिश्चंद्र 

14 comments:

Udan Tashtari said...

विचारणीय विषय वस्तु.

’हिन्दी हमारी पहचान है’

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत ना हिय के शूल | - भारतेंदु हरिश्चंद्र

मैं मारवाड़ी हूं। और यहां राजस्‍थान के एक छोटे से शहर बीकानेर में मारवाड़ी से हटकर बच्‍चों को हिन्‍दी सिखाने का जोर इतना अधिक है कि स्‍थानीय भाषा मायड़ को दरकिनार कर दिया गया है। मेरे पड़नानाजी मायड़ के इतना अधिक पक्ष में थे कि लोगों को इस भाषा में लिखना सिखाते थे। आज यह भाषा अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही है और लोग अपने घरों में भी हिन्‍दी बोलने लगे हैं तब मैंने अपने पुत्र कान्‍हा को मायड़ में ही शुरू से बोलना सिखाया तो विरोध झेलना पड़ा। लेकिन बाद में जब वह अपनी मीठी जबान से इस मीठी भाषा को बोलता है तो सुनने वाला ठगा सा रह जाता है। मैं गर्व से कह सकता हूं कि मेरी देखा देखी कई लोगों ने अपने बच्‍चों को मायड़ सिखाने की ठानी और कई बच्‍चे मायड़ बोलने लगे हैं। बाहर हिन्‍दी बोलो या अंग्रेजी लेकिन खुद की मातृभाषा में ही भावनाओं को व्‍यक्‍त करने की पूर्ण स्‍वतंत्रता दे पाती है। आपका चिंतन सार्थक लगा।
आभार..

बालसुब्रमण्यम said...

भारतीय भाषाओं का असली शत्रु अंग्रेजी है, हिंदी नहीं। दक्षिण में हिंदी का विरोध आम लोग नहीं कर रहे, उनके लिए तो हिंदी बड़े काम की चीज है। तमिलनाडु में हिंदी राजनीतिक कारणों से स्कूल में नहीं सिखाई जाती, तो लोग निजी तौर पर बड़े यत्न से हिंदी सीख रहे हैं। अंग्रेजीदां लोगों का स्वार्थ अंग्रेजी के साथ जुड़ा हुआ है,पर वे संख्या में कम हैं। इसलिए वे झूठा प्रचार करते हैं कि लोग अग्रेजी पसंद करते हैं, और हिंदी विरोध भड़काते हैं। पर आम आदमी के लिए अंग्रंजी सीखना न संभव है न जरूरी।

हिंदी का खूब मार्केवट वैल्यू है। जिस भाषा को 50 करोड़ लोग बोलते हों, उसे कोई भी व्यवसाय नजरंदाज नहीं कर सकता। झकमारकर ही उन्हें हिंदी अपनानी होगी, और वे अपना भी रहे हैं।

आपने जो सवाल उठाए हैं उनमें से कई सवालों के बड़े अच्छे जवाब आपको डा. रामविलास शर्मा की इन दो किताबों में मिल जाएंगे। जरूर इन्हें खरीदें और बारबार पढ़ें और उसके बाद इस विषय पर कुछ और पोस्ट जरूर लिखें -

1. भारत की भाषा समस्या
2. भाषा और समाज

दोनों राजकमल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं।

Atmaram Sharma said...

सुब्रमण्यम जी ने बहुत सही रास्ता दिखाया है, डॉ. रामविलास जी ने हिंदी की दशा और दिशा पर बहुत काम किया है. लेकिन आपके ही तर्क में कहा जाय तो यह काम भी बेकाम-सा हो गया है. क्योंकि जब हिंदी को बरतने वाले ही हीन ग्रंथि के शिकार हैं तो उसकी महानता के गीत गाने से क्या होगा?

बहुत अच्छी पोस्ट. साधुवाद.

जगदीश त्रिपाठी said...

हिंदी को लेकर आपकी चिंता देश के प्रति आपके सरोकारों को प्रतिबिंबित करती है। सुदूर विदेश में बैठा एक युवक अंग्रेजी की गुलामी को तोड़ने के लिए अभियान चला रहा है। यह देख मन को काफी अच्छा लगता है। आखिर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में भी तो विदेश में रह रहे सेनानियों प्रमुख भूमिका निभाई थी। एक भाई ने अपनी टिप्पणी में मारवाड़ की स्थानीय बोली मायड़ का जिक्र किया है। हमें अपनी स्थानीय बोलियों से कतई दूर नहीं होना चाहिए क्योंकि वे हिंदी अथवा संस्कृत से ही उपजी हैं। बेहतर तो यह होगा कि स्थानीय भाषाओं के शब्द हम हिंदी में समाहित करें। इससे हिंदी और समृद्ध होगी।
आपके आलेख को पढ़ने में देर हुई। पर अब ऐसा नहीं होगा। आपके ब्लाग को मैंने अपनी सूची में जोड़ लिया है। बाकी सारी पोस्टें भी पढ़ ली हैं।

'अदा' said...

हिंदी के प्रति अनुराग कितना है हम विदेशों में रहने वालों को यह स्पष्ट रूप से आपकी रचना दर्शाती है, हिंदी की उपेक्षा सबसे ज्यादा उसके घर में ही हो रही है, मैं जब भी भारत जाती हूँ और यकीन मानिये साल में एक बार अवश्य जाती हूँ, हर बार और अधिक अंग्रेजी देख कर मन वितृष्णा से भर उठता है, मुझे एक घटना या दुर्घटना कहें याद है, मुझे इन्टरनेट कनेक्शन कि जरूरत थी, सारी कागजी कार्यवाही पूरी करने के बावजूद भी वो उस दिन नहीं लगा जिस दिन मुझसे कहा गया था, मेरे पूछने पर यह बताया गया कि एड्रेस वेरिफिकेशन नहीं हो पाया है मैंने पूछा वो आप कैसे करते हैं, उनका कहना था कि कोई आपके घर आया था लेकिन आप नहीं थी इसलिए वेरिफिकेशन नहीं हो पाया, मैंने पूछा आप किस समय आये थे उन्होंने ने कहा कि १० बजे सुबह, मैंने जब उनसे कहा कि १० बजे सुबह जब आप काम पर हैं तो मैं भी तो काम पर ही हूंगी न उस वक्त कोई कैसे घर पर हो सकता है, ये सारी बातें हिंदी में हो रही थी, बात नहीं बनते देख मैंने धुअधार अंग्रेजी देनी शुरू की और कहा कि मुझे आपके प्रेजिडेंट, managing director जो हैं उनसे बात कराएं, मेरी बात उनके managing director से हुई 'अंग्रेजी में' और १० मिनट के अन्दर मुझे इन्टरनेट कनेक्शन मिल गया जिसकी सूचना तक managing director ने खुद मुझे फ़ोन करके दिया, तो ये है अंग्रेजी का कमाल, आपमें चाहे लाख काबिलियत है अगर आप अंग्रेजी में बात नहीं कर रहे लोग आपकी और ध्यान नहीं देंगे, जैसे ही आंग्ल भाषा आपके मुख से प्रस्फुटित हुई लोग आपको एकदम से पूजनीय मानने लगते हैं ये है हमारा भारत, जब हम स्वयं अपनी भाषा से शर्माते हैं तो दुसरे क्या सम्मान देंगे ?
इसको प्रतिष्ठित बनाने की शुरुआत हमारे प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति को करना चाहिए, उन्हें अपने सभी भाषण हिंदी में देने चाहिए और जहाँ भी भाषण दिया जा रहा हो यह उस देश, राष्ट्र की जिम्मेवारी होनी चाहिए कि उसका अनुवाद बाकि सुननेवालों के लिए करें, आखिर चाइना के नेता, रशिया के नेता ऐसा ही तो करते हैं. इसकी शुरुआत वो करें देखिये कैसे हिंदी सबल होती है, समृद्ध तो है ही हमारी हिंदी..
एक और बात विदेशों में रहने जो आते है आते साथ ही अपना नाम बदल देते हैं, हरिसिंह हो जाते हैं हैरी, गुरमीत होजाते है गैरी और पता नहीं क्या क्या. हमें अपना नाम क्यों बदलना है, नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाने की समस्या विदेशियों की है हमारी नहीं, जैसे मेरे बेटे का नाम है "मृगांक" उसे बहुतों ने कहा की नाम तुम्हारा कठिन है, बदल डालो, मृगांक का जवाब था यह तुम्हारी समस्या है मेरी नहीं, जब तुम "आर्नोल्ड स्वास्नेगर" कह सकते हो तो "मृगांक" भी कह लोगे और आश्चर्य की बात अब उसके सभी दोस्त उसे "मृगांक" ही कहते हैं,
इसलिए किसी और से हिंदी के लिए प्रतिष्ठा की उम्मीद से पहले हम घर से इसकी इज्ज़त करने की शुरुआत करे, बाकी तो लोग आते ही जायेंगे और कारवाँ बनता ही जाएगा....
आप एक कठिन लेकिन सार्थक प्रयास कर रहे हैं, हम आपके साथ है...हर कदम....

विवेक सिंह said...

बालसुब्रमण्यम जी से सहमत हूँ मैंने भी तमिलनाडु को तीन साल रहकर देखा है !

दर्पण साह "दर्शन" said...

bandhu kya aapko pata hai india (bharat nahi) ki rashtriya bahsha kya hai?

hindi?

ji nahi....

:(

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