Monday, July 6, 2009

उत्तिष्ट, उत्तिष्ट, उत्तिष्ट ..

भा.ज.पा. की हार से एक सच्चा हिन्दू हतास और किकर्तव्यमुड की अवस्था मैं है | हम हिन्दुओं को सच पूछे तो समझ मैं ही नहीं आ रहा है की क्या करें अब ? भा.ज.पा. अपनी पुराणी गलतियों से सबक लेना नहीं चाहती, पार्टी के बड़े-बड़े नेता बस अपनी ही रोटी सकने मैं लगे हैं | सच्चा हिन्दू दिग्भ्रमित है,  क्योंकी उनकी अपनी पार्टी  भा.ज.पा. कांग्रेस के रस्ते पे चल चुकी है | कई ऐसे मित्रों से मिलता हूँ जिसकी आँखें भर आती है आज हिन्दुओं की दुर्दशा पे | आज हिन्दू किसे अपना कहे, भा.ज.पा. तो अपने को एक बूढा हारा  हुआ सेर मान बैठी है जो आगे संगठित हो कर लड़ने की इच्छा शक्ती भी खोती जा रही है | 

जो हुआ सो हुआ, आखिर कर कब तक हम हिन्दू ऐसे ही शोक मानते रहेंगे? उठो भाइयों अपनी जाती , धन के लिए किसी भी हद तक निचे गिरना वाली संकीर्णता को छोडो और उठ कर दिखाओ की हिन्दू मरा नहीं है और ना मरेगा | पूरा EUROPE एक दसक मैं ही क्रिश्चियन बन गया किन्तु भारत १००० साल गुलाम रहे के बाद भी हिन्दू बाहुल है, ये क्या साबित नहीं करते की हिन्दू हार नहीं मानाने वाला | खड़े हो, बड़े लेवल की छोडो अपने आस पास ही कई ऐसे मौके आयेंगे जहाँ हम ये साबित कर सकते हैं की देखो भगवान् मैंने बिना अपने स्वार्थ के ये सब अपने देश, धर्मं के लिए किया | कोई देखे या न देखे भगवान् देख रहा है बस यही सोच कर हम हिन्दुओं को अपने देश धर्मं के लिए काम करना पड़ेगा | 

एक पढ़ा लिखा हिन्दू आम तौर पे यही बोलता है की आर.एस.एस. वाले कुछ करते नहीं | अरे भाई जब हम खुद ही अपने को आर.एस.एस. से नहीं जोडेंगे तो आर.एस.एस. का काम कोई मशीन आकर कर देगा ? आर.एस.एस. या हिन्दू संस्था से जुड़ने मैं सरम कैसी, कोई चोरी डाका तो नहीं कर रहे हैं | गुलामी वाली मानसिकता को त्यागो और अपने वैदिक संस्कृति को जानो, सम्मान करो | सिर्फ मुह से हिन्दू-हिन्दू और कर्म से कुछ और ये नहीं चलेगा | माइकल जेक्सन, मेडोना आदि अच्छे लगते हैं तो ठीक है पर कभी कभी अपने भीमसेन, जसराज जी ... को भी सुन लिया करो | हैरी पॉटर के साथ साथ कभी सच्चे मन से एक-दो पुराण की कहानी भी पढ़ लिया करो | बच्चे को इंग्लिश के सारी रायाम्स याद करा दिए अब अपनी पंचतंत्र की एक-दो कहानी भी याद करा दो | जींस तो रोज पहनते हो, मंदिरों मैं ही सही कभी कभी धोती तो पहन लिया करो | क्या एक मुस्लिम दुसरे मुस्लिम भाई को देख कर सलाम आलेकुम कहने मैं कोई सरम महूस करता है ? नहीं , तो फिर हम हिन्दू क्यों नमस्कार, प्रणाम, या राम-राम कहने से जी चुराते हैं ? अपने को  PURE WESTERN बना के रखना और बाकियों से ये आशा करना की वो सभ्यता - संस्कृति का रक्षा-पालन करे, क्यों ऐसे ही चलेगा हम पढ़े लिखे लोगों का धर्मं, सभ्यता-सांस्कृतिक प्रेम ? युद्ध तो हमें ही लड़नी है, भगवान् तो हमें सिर्फ रास्ता दिखायेंगे | 

7 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

राकेश जी, न तो भाजपा हिन्दू है और न हिन्दू भाजपा है. भाजपा से जन्म से पहले भी भारत और हिंदुत्व था और भाजपा के पतन के बाद भी रहेगा!

'अदा' said...

यह सच है की भा.जा.प्. की छवि एक हिन्दू पार्टी की है, और इसके पतन का सबसे बड़ा कारण भी यही है, शुरुआत में भा.जा.पा. की नीति राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर चलती थी, बाबरी मस्जिद एक राष्ट्रीय मुद्दा थी, यह सिर्फ हिन्दुओं का मुद्दा नहीं था, लेकिन पता नहीं कैसे इसे हिंदुत्व का जामा पहना दिया गया, और सब कुछ बदलता चला गया, भा.जा.पा. जबतक मुद्दों को राष्ट्रीय बना कर सामने नहीं लाएगी विश्वास जीतना मुश्किल है, एक बात और है भा.जा.पा. को नयी दिशा देने के लिए नया खून चाहिए, अब समय आ गया है की पार्टी के बुजुर्ग अपना दायित्व नौजवानों को दें, बूढी सोच और बूढे विचार अब नहीं चलेंगे, पार्टी प्रधान अब बदलते समय के साथ ताल मेल नहीं रख पायेंगे, वैसे भी अधेड़ और बुडे इतने संकुचित विचारों के हो गए हैं की सारी उर्जा उनको बात समझाने में ही चली जाती है, सबसे पहले लालकृष्ण आडवानी अपनी कुर्सी छोडें, उनकी छवि एक जिद्दी इंसान की बन गयी है जिन्हें सिर्फ प्रधान मंत्री बनने की लालसा है, नया खून नया जोश और नए विचार वालों की आवश्यकता हैं, मैं भा.जा.पा. समर्थक हूँ लेकिन मुझे अब इनमें काफी खामियां नज़र आने लगीं हैं, और मन व्यथित होता है देखकर, लेकिन इसका निदान सिर्फ यही है और कुछ नहीं......

राकेश सिंह said...

अदा जी मैं आपके विचार से पूरा सहमत हूँ |

'अदा' said...

राकेश जी,
मेरी पहली टिपण्णी सिर्फ भा.जा.पा. को लेकर थी, अ़ब आते हैं हमारे भारतीयों पर, खास करके हिन्दुओं कि मानसिकता पर, पता नही क्यों हम हिन्दू बहुत जल्दी किसी भी बात से influenced हो जाते हैं, किसी ने कह दिया कि फ़लाने बाबा के पास चले जाओ फायदा होगा हम फ़ौरन पहुँच जाते हैं, या फिर लाल मिर्ची से हफ्ते में एक बार अपनी आँखें धोया करो १०० करोड़ मिलेंगे तो देखिये कितने लोग इस पर काम शुरू कर देंगे, मतलब यह कि हमारी हर सोच सिर्फ और सिर्फ भौतिक फायेदे के लिए होती है, दूसरी बात हम लोगों में आपसी एकता बिलकुल नहीं है, हर वक़्त competetion कि भावना , फ़लाने के बेटे ने MBA कर लिया, यह सुना नहीं कि बस अपने बेटे कि कवायद शुरू कर दी, पडोसी के घर ६० इंच का टी. वी. आया तो हमारे घर में ६०० इंच का टी.वी. चाहिए, दिखावा तो कूट-कूट कर भरा है हम लोगों में, बहुत कम लोग मिलेंगे जिन्हें अपनी संस्कृति के प्रति कोई अनुराग है, मैं ऐसे भी लोगों से मिल चुकी हूँ कनाडा में जिन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में खुद को भारतीय कहाने से मना कर दिया, जब हम खुद ही अपने तीज-त्योहारों कि पृष्ठभूमि नहीं जानते तो हम बच्चो को क्या बताएँगे, जहाँ तक वेद-पुराणों का प्रश्न है उनको सीधे-सरल माध्यम में बनाने कि आवश्यकता है (विडियो, ऑडियो) ताकि लोग समझ पाएं, साथ ही उन्हें ऐसा बनाना चाहिए जो नवयुवकों को लुभा सके, तभी बात बनेगी, आज हमारे नवयुवक-नवयुवतियों को सही मार्गदर्शन देने वाला नहीं है, जब माँ-बाप ही पाश्चात्य संस्कृति में इतने लिपे-पुते हों तो बच्चे क्या करेंगे, आज कल हिंदी बोलना दकियानूसी माना जाता है, एक वाकया हुआ मेरे साथ मैंने यहाँ कनाडा में भारतीय दूतावास में फ़ोन किया, मैंने हिंदी में बात शुरू कि लेकिन जिनसे मैं बात कर रही थी उन्होंने तो जैसे हिंदी नहीं बोलने कि कसम खायी हुई थी आखिर मुझे कहना पड़ा, जब भारतीय दूतावास में हिंदी बोलने वाले नहीं हैं तो हिंदी को तो मृत ही मान लेना चाहिए, मैंने बहुत हंगामा किया उसके बाद मुझसे अब हमेशा हिंदी में ही बात कि जाती है,

भारतीयों को यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हम औरों कि अपेक्षा अधिक भाग्यशाली हैं, वहाँ कि दुनिया भी हमारे हाथ में है और इस दुनिया को भी हम बहुत आराम से अपना लेते हैं, ज़रूरी है बैलेंस बना कर रखना, जहाँ तक पहनने ओढ़ने कि बात है वो तो बहुत ही ऊपरी बात है, पहले अन्दर के कल-पुर्जे ठीक कर लें बाहर कि पैकिंग तो हो ही जायेगी....

राकेश सिंह said...

अदा जी नमस्कार,

इसमें कोई शक नहीं की हमारी हर सोच सिर्फ भौतिक फायेदे के इर्द-गिर्द ही घुमती रहती है, ओर गलत प्रतियोगिता की भावना कूट-कूट कर भरी है | ओर शायद इसके पीछे का कारण है सही ज्ञान की कमी | यही कारण लागू होती है अपनी संस्कृति के प्रति उदासीनता का | हम जिस शिक्षा पद्धती मैं बड़े हो रहे है उसके करता-धरता थे Thomas Babbington Macaulay , उनके विचार देखिये कैसे थे : "It is impossible for us, with our limited means, to attempt to educate the body of the people. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons, Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in morals, and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from the Western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population". आगे देखें Macaulay के बारे मैं दुसरे लोग क्या कहते हैं : Malcolm Muggeridge, who worked in India as a teacher and journalist for long years, “that a people can be laid waste culturally, as well as physically—not only in their land but in their inner life—as if it is sown with salt. That is what happened in India; an alien culture, itself exhausted, trivialised and shallow, was imposed on them. When we (British) went, we left behind... a spiritual wasteland. We had drained the country of its life and creativity, making it a place of echoes and mimicry. अब बताइए की इस एजूकेशन सिस्टम से हम क्या आशा करें? पिछले १००० साल से हम गुलाम हैं ओर इस गुलामी के दौरान कैसे कैसे हिन्दुओं को तोडा मरोदा गया इसको जानने के लिए विस्तार मैं जाना पडेगा | एक सावल ये भी आता है की हम भी तो इसी इस एजूकेशन सिस्टम के प्रोडक्ट हैं , देखिये वैदिक संस्कृति हमारे जीवन मैं ही रची बसी थी ओर वो हमलोगों मैं भी आ गई लेकिन सबों के साथ ऐसा नहीं होगा क्योंकी यहीं पे घर-परिवार का संस्कार दिखता है |

वैसे हमारी वैदिक संस्कृति की ज्ञान भी नहीं के बराबर है क्योंकी हम कभी इसके लिए गंभीर नहीं हुए | मैं अपना उद्धरण देता हूँ, मैंने कंप्यूटर जानने के लिए ना जाने कितनी पुस्तक पढ़ डाली तब जाकर कहीं कंप्यूटर का सही ज्ञान हुआ वो भी पूरा-पूरा नहीं लेकिन वैदिक संस्कृति को जानने के लिए शायद ही कोई प्रमाणिक ग्रन्थ गंभीरता से पढ़ी हो | यहाँ पे एक बात ओर आती है वैदिक ज्ञान सिर्फ ग्रन्थ पढ़ कर नहीं आ सकती उसके लिए गुरु आवश्यक है, हमारे शास्त्रों मैं बहुत कुछ ऐशा है जिसको अपने से पड़ेंगे तो उसका अर्थ उलटा समझेंगे | लेकिन आज सच्चे गुरु किधर हैं ? सच्चा गुरु मिलना थोडा मुस्किल काम है, सचे गुरु अभी भी होंगे ही ओर वास्तविक ज्ञान के लिए हर मनुष्य का कर्त्तव्य है की वो सच्चे गुरु को ढूँढ कर सर्नागती करे | सच बताऊँ मुझे अभी तक गुरु मिला ही नहीं है, या phir मेरा दोष है की मैं सच्चे गुरु को पहचान नहीं पा रहा, देखते हैं कब मिलते हैं |

मैं आपके हिंदी प्रेम को नमन करता हूँ, ऐसे छोटे छोटे प्रयास यदि १०% लोग भी करें तो इस्थिती मैं काफी सुधर आयेगा | हम वैदिक लोग औरों से कहीं अच्छे हैं, ये मैं-आप नहीं विश्व के महान विचारक कहते हैं | इसपे मैं थोडा विस्तार से चर्चा करेंगे थोडा बाद मैं |

जगदीश त्रिपाठी said...

संघ लक्ष्य इस देश को परम वैभव तक ले जाना है। भारतीय जनसंघ या भाजपा उसके लिए साधन के तौर पर बने। यह बात अलग है कि सत्ता में आने के बाद भाजपाइयों को मूल लक्ष्य भूल गया और उन्होंने सत्ता को लक्ष्य मान लिया।

रवि धवन said...

कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी.
सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जमाना हमारा.
आपकी तरह अगर हर हिन्दुस्तानी हिंदी को
अपना मान ले तो ये दुनिया हमारे कदमो में होगी.