Tuesday, October 20, 2009

धार्मिक स्थलों मैं फोटो खींचने की मनाही क्यूँ जायज है

राजकुमार जी ने आपने पोस्ट मैं मंदिर मैं फोटो खींचने की मनाही को गलत ठहराते हैं | उनकी पूरी पोस्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है मंदिरों में फोटो खींचना क्यों मना है?  

उन्होने फोटो खींचने की मनाही को धार्मिक स्थलों के व्यापारिकरन से जोड़ा है | कुछ हद तक उनकी बात भी सही है और मेरा भी मानना है की धार्मिक स्थलों के व्यापारिकरन का विरोध होना ही चाहिए, पर गलत तरीके से फोटो खींचने के प्रचालन को बढावा देकर नहीं |  

जिस किसी भी मंदिर मैं फोटो खींचने की कोई मनाही नहीं रहती है, वहां अक्सर लोगों का नंगापन देखने को मिलता है | लगभग ९०% लोग अपना नितंभ (अपना पिछवाडा) भगवान की मूर्ति की तरफ करके ही फोटो खिंचवाते हैं | फोटो खिंचवाने वाला बड़ा और भगवान् पीछे छोटे | फोटो भगवन की मूर्ति के आगे बैठ कर या मूर्ति के बगल मैं खड़े रह कर भी खिंचवाई जा सकती है | पर ऐसा कोई करता नहीं, क्योंकि हर आदमी को भगवान् के फोटो से ज्यादा अपना फोटो बड़ा दिखाना है |  

भले ही गिने-चुने समझदार लोग सिर्फ भगवान् का फोटो खींचते हो और इसपे कोई मना करे तो बुरा जरुर लगेगा ... पर जरा दुसरे दृष्टिकोण से भी सोचें की मंदिर प्रशासन कितने लोगों को ये समझता फिरे की किस तरह की फोटो allowed होगी और किस तरह की नहीं ?  

एक दूसरा बड़ा कारण ये भी है की आम भारतीय किसी पर्यटन स्थल या अन्य जगहों का वास्तविक आनंद ना लेकर फोटो खींचने मैं ही मशगुल रहते हैं | खैर लोग फोटो खींचे या कुछ और करें ये तो उनका व्यक्तिगत मामला है | पर मंदिर जाने का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए इश्वर से सन्निकटता | इस सन्निकटता मैं मोबाइल फ़ोन या कैमरे की क्या आवश्यकता?  

आये दिन ये देखने को मिलता है की मंदिर मैं भी पूजा के समय भी मोबाइल फ़ोन पे लोग बात करते रहते हैं, इससे अन्य भक्तों को असुविधा होती है | क्या मंदिर मैं २०-१५ मिनट के लिए मोबाइल फ़ोन बंद नहीं रखा जा सकता ? यही कहानी कामो बेश कैमरे पे भी लागू होती है | भगवान् - भक्ति, पूजा पाठ छोड़ कर ज्यादातर लोग फोटो खींचने मैं ही मशगुल हो जाते हैं |

Wednesday, October 14, 2009

कामसूत्र विवेचन : आम धारणाओं से अलग

आम तौर पे कामसूत्र को सिर्फ़ काम और यौन क्रियाओं का पुस्तक माना जाता है | ये सत्य है कि काम क्रियाओं का विस्तार वर्णन है इस ग्रन्थ में, पर धर्म, अर्थ और मोक्ष पर भी चर्चा रोचक और सुन्दर है | आम धारणा (काम क्रियाओं) से हट कर महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र को देखने का प्रयास है ये पोस्ट | कामसूत्र की कुछ मुख्य बातें बिन्दुवार रुप मैं इस प्रकार रखा है :  

• भारतीय सभ्यता की आधारशिला चतुर्वर्गिय – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है | मनुष्य की समस्त अभिलाषाएँ इन्हीं चारों के अन्तर्गत रहती हैं| इसमें मोक्ष अन्तिम लक्ष्य है | मनुष्य के शरीर के पोषन और संवर्धन के लिए अर्थ की; मन तुष्टि के लिए काम की; बुद्धि के लिये धर्म की और आत्मा के लिए मोक्ष की आवश्यकता पङती है | ये आवश्यकताएं अनिवार्य हैं, अपरिहार्य हैं | क्योंकि बिन भोजन-वस्त्र के शरीर कृश निष्क्रिय बन जाता है | काम बिना स्त्री का मन कुण्ठित – निकम्मा बन जाता है | बिना धर्म (सत्य, न्याय) के बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है | और बिन मोक्ष के आत्मा पतित बन जाता है |  

बिना शरीर के मोक्ष साधना नहीं हो सकती और मोक्ष साधना के बिना अर्थ, काम को सहयोग नहीं मिल सकता | इसलिए मोक्ष की सच्ची कामना रखकर ही अर्थ और काम का उपभोग करना चाहिए | बिना मोक्ष कामना के अर्थ और काम का उपभोग स्वार्थी और कामी लोग ही करते हैं | ऐसे लोगों को समाज, राष्ट्र का शत्रु बताया गया है | ये तो प्रकट ही है की जहां स्वार्थ और कामलोलुपता बढ जाती है, वहीं समाज और राष्ट का पतन हो जाता है |  

• महर्षि वात्सयायन कहते हैं, अर्थ सिद्धि के लिये तरह-तरह के उपाय करने पडते हैं इसलिये उन उपायों को बतानेवाले अर्थशास्त्र की आवश्यकता पडती है | सम्भोग के पराधीन होने के कारण स्त्री और पुरुष को उस पराधीनता से बचने के लिये कामशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है | महर्षि वात्सयायन ने कामसूत्र में मुख्यतया धर्म, अर्थ और काम की व्याख्या की है |  

• कामशास्त्र से ही ये जाना जाता है की संभोग का सर्वोत्तम और आध्यात्मिक उद्देश्य है – पति-पत्नी की आध्यात्मिकता, मनव प्रेम और परोपकार तथा उदात्त भावनाओं का विकास| हिंदू सभ्यता की बुनियाद वेद की शिक्षा ही है | संसार से उतना ही अर्थ और काम लिया जाय जिससे मोक्ष को सहायता मिले | मुमुक्षु को उतने ही भोग्य पदार्थ को लेना चाहिए जितने के ग्रहण करने से किसी प्राणी को कष्ट ना पहुंचे |  

• काम का प्रमुख भाग आकर्षण है अथवा आकर्षण का प्रमुख अंग काम है | यही आकर्षण जब बड़ों के प्रति होता है तो ये श्रद्धा, भक्ति आदि पुनीत भावों मैं दिखाई पड़ता है; यही आकर्षण बराबर वालों के प्रति मित्रता, प्रेम और सखाभाव के रुप मैं परिणत होता है | यही अपनों से छोटों के प्रति दया, अनुकम्पा के रुप मैं प्रकट होता है | वही काम, माता के स्तनों मैं वात्सल्य के रुप मैं, प्रेमी का आलिंगन करते समय कामरुप में और वही काम दिन-दुखियों के प्रति करुणा कृपा के रुप में अवतरित होता है |  

• सूर्य अपनी शक्ति से पृथ्वी का रस ग्रहण करता है और चन्द्रमा धरती पर सुधावर्षण करता है | सौरतत्व स्त्री का रज चन्द्रतत्व मय पुरुष के वीर्य को खींच कर अपने अन्दर धारण करता है | यही स्त्री - पुरुष के परस्पर आकर्षण का मुख्य कारण है |

Wednesday, October 7, 2009

सावधान : शंकराचार्य की अपील - कुरान बांटों और इस्लाम कबुल करो !!!

मैं बकवास कर रहा हूँ, ऐसा सोचने से पहले कृपया कर आप ये यू ट्यूब विडियो देख लीजिए : 

 

अब तो विश्वास हुआ? जब मुझ पर विश्वास हुआ है तो पुरी पोस्ट पढ ही लीजिये | इस विडियो को लगभग २ लाख २० हज़ार बार देखा गया है | और मेरा अनुमान है की कम से कम ४-५% हिन्दुओं ने (मुस्लिम तो शायद ७०%) इसे सच ही माना होगा | डॉ. जाकिर नायक जैसे लोग इन्ही ४-५% लोगों को इस्लाम काबुल करवाने का टारगेट बनाते हैं | जब ८-१० हज़ार लोग जो ये इस प्रकार के विडियो को सच मान लेते हैं, उसमे से कम से हज़ार दो हज़ार तो इस्लाम काबुल कर ही लेते होंगे | यही तो डॉ. जाकिर और उनके चेलों का उद्देश्य है |


जब हमारे शंकराचार्य ही कुरान का प्रचार कर रहे हैं तो हम भी कुरान की सरण में चलें, क्यों? चलिए लगे हाथों ये भी बता दूँ कि ये शंकराचार्य नकली हैं | ये विडियो भी देख ही लीजिए: 






हिन्दुओं के साथ ये धोखा किया है (और आगे भी करते रहेंगें), इस्लाम के जानेमाने विद्वान ज़ाकिर नायक ने | ज़ाकिर नायक या नकली बाबा ने ये नहीं बताया की किस मठ के शंकराचार्य हैं ये? वैसे ढेर सारे लोगों ने भी जाकिर नायक को खुली चुनौती दी है की बताएं ये ढोंगी किस मठ के शंकराचार्य हैं और जिसका जवाब आज तक ज़ाकिर साहब ने नहीं दिया है | ज़ाकिर साहब जवाब देने से हिचकिचा रहे हैं, चलिए मैं ही बता देता हूँ | ये गेरुआ वस्त्र पहना ढोंगी कोई और नहीं बल्कि ज़ाकिर नायक के मदरसे के शंकराचार्य हैं | मदरसे भी अब शंकराचार्य बनाने लगे हैं, ज़ाकिर नायक ने मदरसे मैं क्रांति ला दी है | इस क्रांति पे आप कुछ कहना चाहेंगे?  

As usual our secular brothers will call me wrong or keep quiet. Oh, I fogot seculars may also say Fake Sankaracharyaa is right.  

नोट: अंग्रेजी मैं लिखने के लिए क्षमा चाहूँगा, क्या करूँ सेकुलर ज्यादातर विदेशी भाषा प्रिय है तो उन्हें अंग्रेजी ज्यादा अच्छी समझ मैं आएगी | 

क्षमा चाहूँगा यदि किसी बंधू ने इस विषय पे पहले ही पोस्ट की हो | पर मुझे लगता है कि हर महीने - दो महीने मैं इसपे एक आलेख आना चाहिए | 

Sunday, October 4, 2009

हमास प्रायोजित शादी, क्या ऐसा होता है?

तस्वीरों को देख अनुमान लगाईये, इन मासूम बच्चियों का हाथ किसने पकड़ रक्खा है ? शायद बाप, चाचा, बड़ा भाई, या कोई और सम्बन्धी ही होगा ..., नहीं ... ये रिश्ता कोई और है | १० वर्षों से भी कम उम्र कि लड़कियों का हाथ पकडे कोई और नहीं बल्कि उसका दुल्हा है, जी हाँ | क्या अब भी तस्वीरें खुबसूरत लग रही हैं?




ये सारी तस्वीरें गाजा मैं उस हमास (Islamic Resistance Movement) प्रायोजित विवाह समारोह से ली गई हैं जिसमे ४५० जोडों की शादी कराई गई (अगस्त २००९) | हमास नेता महमूद जहार ने खुद ही दूल्हा-दुल्हन जोड़ी को बधाई दी | हमास की तरफ से हर दुल्हे को $500 (५०० डालर) और दुल्हन को white gown भेंट किया गया |

हमास नेता इब्राहिम सलाफ के मुताबिक - "हमास की तरफ से ये शादी का उपहार उन वीर जवानों के लिए है जो इस्राईल के खिलाफ युद्ध मैं बहादुरी से लड़े हैं" |  

यू ट्यूब विडियो लिंक : http://www.youtube.com/watch?v=RYmtaXQHEtw  

International Center for Research on Women का अनुमान है की लगभग ५ करोड़ child brides दुनिया के सभी देशों मैं हैं, जिसमे ज्यादातर देश इस्लामिक देश ही हैं | 

नोट : क्या इस तरह की खबरों को ब्लॉग का विषय बनाया जाना चाहिए? ये प्रश्न तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब ये देखता हूँ की आज की मीडिया मैं इसे खबर नहीं के बराबर आती हैं | आपकी राय महत्वपूर्ण है |

Wednesday, September 30, 2009

ब्लोगवाणी पे आरोप लगाने वालों के लिए प्रश्न


किसी पे आरोप लगाने से पहले पूरी पड़ताल कर लेनी चाहिए | मुझे लगता है कि जिस ब्लॉग के पोस्ट पर ब्लोगवानी बंद कि गई थी वो आलेख पूरी पड़ताल के बिना ही लिखी गई है | इसे समझाने के लिए ब्लोग्वानी प्रकरण से हट कर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ :

* पिछले वर्ष गूगल से checkout करने पर $10 का discount मिलता था (one time only). मैंने अपने account से एक के बजाय २-3 transactions किया और सभी successful रहे और टोटल $30 का discount मुझे मिला, जबकि गूगल साफ़ कहता था ONLY ONE DISCOUNT WILL BE GIVEN (per a/c) | लगभग उसी समय मेरे साथी ने पहली बार google checkout try किया और उन्हें कोई discount नहीं मिला | और ऐसा कईयों के साथ हुआ था |  

अब आरोप लगाने वालों के हिसाब से सोचे तो google मेरे पे मेहरबान और मेरी साथी पे दुश्मनी उतार रहा था, आप क्या कहेंगे इसपे ?  

* और एक उदहारण देता हूँ इसी वर्ष microsoft - ebay cashback मैं कईयों को आसानी से discount मिला तो किसी का valid transaction होने के बावजूद कोई कैश बेक नहीं |  

क्या कहें की माइक्रोसॉफ्ट कुछ लोगों से दुश्मनी निकाल रहा है?  

* मेरे ब्लॉग पे कोई भी टिप्पणी आती है तो मुझे इ-मेल आती थी, अभी कुछ दिनों से किसी टिप्पणी पे इ-मेल आती है किसी पे नहीं |

क्या कहें google मुझसे पक्षपात कर रहा है?

आरोप लगाने वालें ने ये भी लिखा है कि किसी खास विचारधारा वालों की पसंद बढती रहती है | मैंने तो सलीम भाई के पोस्ट पे पसंद ज्यादातर ऊँची ही देखि है, हालाँकि कमेन्ट गिने चुने (२-४) होते हैं पर पसंद मैं आगे रहते हैं | कंप्यूटर का जानकार ये समझ सकता है कि पसंद कैसे उंचा रखा जा सकता है | यहाँ तो मुझे ये समझ मैं नहीं आया कि सलीम भाई कि बात कर रहे हैं या किसी और की, खुल के बताया तो नहीं है |

मेरी राय मैं कोई भी प्रोग्राम १००% परफेक्ट नहीं होता, खासकर web based प्रोग्राम तो नहीं ही | कई बार cookies, trojans, proxy, DHCP.... आदि से ऐसा कमाल और गोल-माल होता है की क्या बताऊँ | वैसे गूगल मैं सर्च करके भी थोडी बहुत जानकारी इसपे हासिल कर सकते हैं | ब्लोग्वानी पे जो आरोप उन्होंने लगाया है उसपे एक software programmer हंसेगा ही | हाँ आरोप लगानेवालों ने यदि ब्लोग्वानी के सारे सिक्यूरिटी पॉलिसी और प्रोग्राम को चेक करवाने के बाद ये सब आरोप लगाये होते तो मैं या एक सॉफ्टवेर का जानकार आरोप लगानेवाले का समर्थन कर सकता था | पर ऐसा तो उन्होंने किया ही नहीं, तो उनके आरोप की मिथ्या क्यों ना कहा जाए ?

और भी कई चीजें हैं जिसका उल्लेख नहीं किया है | आशा है पठाक और आरोप लगाने वाले मेरे विचार को अन्यथा नहीं लेंगे ... मैंने वही लिखा है जो सच है ... ब्लोग्वानी से मेरा कोई दूर-दूर तक का रिश्ता नाता नहीं है (सिवाय ब्लॉग लेखन के) | मेरा पिछ्ला पोस्ट देख सकते हैं, मैंने ब्लोग्वानी के बदलाव पे भी कई शंकाएँ जताई है |

वैसे भी हम भारतीय लोग किसी अच्छा काम करनेवालों की टांग खिचाई करने मैं पीछे नहीं रहते !

Tuesday, September 29, 2009

ब्लोगवाणी का बदलाव - कई गलत चीजों को जन्म देने वाला है !

सबसे पहले ब्लोग्वानी प्रारंभ करने के लिए धन्यवाद और अपना आभार प्रकट करता हूँ ! इसके साथ साथ ब्लोग्वानी मैं जो बदलाव की बात की है उसपे चर्चा होनी ही चाहिए | और मुझे लगता है कहीं ऐसा ना हो की बदलाव गलत चीजों को जन्म दे दे. मैंने अपनी शंका निचे के शब्दों मैं रही है, शायद कई अन्य लोगों की शंका भी ऐसी ही हो  

BLOGVANI 1. ब्लागवाणी के प्रयोक्ता ही यह फैसला करेंगे कि कौन सा ब्लाग जोड़ना है और कौन सा छोड़ना.  
मेरी शंका : यहाँ पर शायद आप वोटिंग सिस्टम की बात कर रहे हैं | वोटिंग सिस्टम यहाँ फुल प्रूफ़ होना चाहिए | यहाँ ऐसा भी हो सकता है की वोट की संख्या के आधार पे कई बेहतरीन आलेख ब्लोग्वानी से जुड़ ही नहीं पाए | और आप तो शायद जानते ही हैं की हिंदी ब्लॉग्गिंग मैं किसी गंभीर विषय पे कितना भी अच्छा आलेख क्यों नहीं आया हो, टिप्पणी बहुत कम आते हैं| लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं ही होना चाहिए की गंभीर चर्चा वाले आलेख प्रकाशित (पोस्ट) ही ना हो?|  

BLOGVANI 2. सिर्फ ब्लागवाणी के सदस्य ही पसंद कर सकेंगे और यह सब देख सकेंगे कि पसंद किसने की थी ताकी .... हां यह जरूर है कि अब पसन्द/नापसन्द के साथ अनोनिमिटी नहीं रहेगी. यह शायद एक जरूरी पैनल्टी है.  
मेरी शंका : ब्लोग्वानी पे आने वाले हर कोई registered user नहीं होता और हो भी नहीं सकता | मैंने कुछ ऐसे भी लोग देखे हैं जो सीधे ब्लोग्वानी पे आकर लेख पढ़ कर चलते बनते हैं, वो कोई टिप्पणी भी नहीं करते | अब यदि एक पाठक (ब्लॉग लेखक नहीं) को आलेख अच्छा लगा तो वो अपनी पसंद ब्लोग्वानी पे दर्ज नहीं कर सकता |  

BLOGVANI 3. पसंद के साथ ही नापसंद भी लाया जायेगा जिसका प्रयोग भी सिर्फ ब्लागवाणी के सदस्य कर सकेंगे |  
मेरी शंका : हम भारतीय positive बातों के लिए एक जुट नहीं होते पर negative बातें हमें तुंरत एक जुट कर देती हैं | और यदि आपने नापसंद को जोड़ा तो एक ग्रुप बनाकर किसी के आलेख के वास्तविक पसंद को निचे ले आयेंगे | विश्वास कीजिये ये होगा ही | मैं सॉफ्टवेर industry मैं हूँ और पिछले १२ वर्षों से अलग अलग सिस्टम पे काम कर चुका हूँ | कई बड़ी बड़ी कंपनियों के प्रोजेक्ट्स पे काम किया हूँ अभी भी एक बड़ी कंपनी का प्रोजेक्ट्स ही देख रहा हूँ | कोई भी सॉफ्टवेर या प्रोग्राम १००% perfect नहीं हो सकता (including NASA, pentagon, Sony, Nintendo etc....). हेकर्स जब पेंटागन, सोनी, Nintendo और ना जाने कितने के चिप डिजाईन सिक्यूरिटी तक को समय समय पे धता बताते रहते हैं | इस हिसाब से क्या आपको लगता है की नापसंद का गलत उपयोग नहीं किया जायेगा ?  

आये दिन हिंदी ब्लॉग मैं व्यक्तिगत विवाद चलता रहता है और दो ग्रुप बन जाता है | उदाहरण देखिये - संगीता पूरी team vs प्रवीन जाखड team | अब इस अवस्था मैं एक ग्रुप वाले दुसरे ग्रुप वाले के आलेखों को नापसंद ही करेंगे |  

समय समय पर किसी भी सिस्टम मैं आवश्यक सुधार और बदलाव होना ही चाहिए, ब्लोग्वानी मैं भी ऐसा ही होना चाहिए | पर बदलाव से पहले उसके सारे positives & negatives पे अच्छी तरह चर्चा जरुर होनी चाहिए | किसी के आलोचना भर से ही डरकर या उन्हें कुछ दिखाने के लिए बदलाव को वास्तविक बदलाव नहीं बल्कि एक emotional भूल ही कही जायेगी | और ब्लोग्वानी के बदलाव का आधार ही इमोशनल दिख रहा है | 

परिवर्तन करना ही है तो पहले मन शांत कर लें, फिर लगभग एक-दो महीने बाद नए सिरे से सोचें की ब्लोग्वानी और हिंदी ब्लॉग्गिंग के भविष्य के लिए क्या बदलाव आवश्यक हैं | अभी तो मन अशांत ही दिख रहा है, और इस अशांत वातावरण मैं शुभ कार्यों का श्रीगणेश उचित नहीं लगता | आशा है ब्लोग्वानी की टीम इस दिशा मैं ध्यान देगी और समय रहते उचित फैसला करेगी | धन्यवाद !

Sunday, September 27, 2009

माँ : बेटा लड्डू खा लो ...


माँ : बेटा लड्डू खा लो ...

माँ : बेटा राजीव ये लड्डू खा लो, हनुमान जी का प्रसाद है |

राजीव : माँ मैंने कितनी बात तुम्हें कहा है कि मुझे मीठा बिलकुल पसंद नहीं, फिर क्यों मुझे बार-बार लड्डू खाने को कहती हो ?

माँ : ये तो भगवान का प्रसाद है बेटा | पूरा लड्डू ना सही आधा या एक टुकडा ही खा लो |

राजीव : नहीं मीठा खा ही नहीं सकता | इसे किसी और को खिला देना या phir भिखारी को दे देना |
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कुछ दिनों पश्चात राजीव अपनी पत्नी और पुत्र रोकी के साथ एक बर्थ डे पार्टी मैं ...  

यार राजीव today's cake is great, तुम नहीं खाओगे क्या? राजीव : जरुर, अभी खाता हूँ ..... this is really good. Can I have some more?.....  

अब राजीव का बेटा मनीष अपने पिता से पूछ बैठता है | पापा आपने तो दादी जी को कहा की आपको मीठा बिलकुल पसंद नहीं | फिर ढेर सारा केक कैसे खा गए ? 

राजीव : बेटा ... यदि मैं केक ना खाता तो उन्हें बुरा लग जाता इसलिए केक खा लिया ....

Thursday, September 24, 2009

केहुनी-मिलन (elbow shake) - Swine flu से बचने का तरिका ?


बच्चे के रूटीन चेकउप के लिए आज डॉक्टर के पास गया | डॉक्टर ने हाथ मिलाने (hand shake) के बजाय अपनी केहुनी (elbow) आगे बढा दी | एक क्षण को अवाक रह गया की डॉक्टर साहब ये क्या कर रहे हैं, कहीं मुझसे कोई पुराना हिसाब-किताब तो चुकता करने के मुड मैं तो नहीं आ गए? मुझको अवाक देख उन्होंने कहा - give me your elbow. मैंने संकोच करते-करते शिष्टाचारवस ही सही अपना केहुनी (elbow) उनकी केहुनी से सटा तो दी | पर मन मैं एक नई आशंका ने जन्म ले लिया ...कहीं ये इलू-इलू वाला तो नहीं... क्या मैं ऐसा दिखता हूँ कि एक पुरुष डॉ. मुझसे ... छि-छि ... | हिम्मत कर, डॉ. साहब से पूछ ही लिया ये elbow-elbow क्या था, ...? बड़े प्रेम से उस अमेरिकन डॉ. ने elbow-elbow का अर्थ इस प्रकार समझाया :

* It is the newly suggested and advisable way of greeting people rather than handshakes. (हाथ मिलाने की अपेक्षा ये लोगों का सत्कार करने का एक नया और सुझावित तरिका है ) * Swine flu और अन्य कई संक्रामक बिमारी से बचने का एक कारगर/सुरक्षित तरीके के रूप मैं इसका इस्तेमाल अमेरिका, यूरोप .. आदि देशों मैं किया जाने लगा है |                                तो भाई अब यदि भारत मैं कोई आपसे केहुनी-मिलन (elbow shake) करना चाहे तो चौकियेगा नहीं | क्या पता भारत मैं भी केहुनी मिलन का प्रचलन आरम्भ हो गया हो और हमें पता ही नहीं ! वैसे भी अपन देशी लोग तो आँख मुंद कर कॉपी करने मैं माहिर हैं | चेतावनी : भूल से भी अपनी केहुनी किसी आर्जेन्टिना वालों से नहीं मिलाना, लेने के देने पड़ सकते हैं | हाँ यदि आपका विचार आर्जेन्टिना वाले की बेटी से शादी करने का है तो केहुनी से केहुनी जरुर मिला सकते हैं | वैसे हमारे पास केहुनी मिलन या हाथ मिलाने का एक सुन्दर और अजमाया हुआ विकल्प है - अपने दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम, नमस्कार या नमस्ते कहने का | कुछ अमेरिकन अब लोगों का अभिवादन नमस्ते की मुद्रा मैं भी कर रहे हैं |


पर imported thought (आयातित विचार) प्रेमी भारत मैं, किसी देशी विचार या हाव-भाव या हाथ जोड़ कर प्रणाम/नमस्ते को तरजीह देने की संभावना क्षीण ही लगती है | फिर भी ये एक अच्छा मौका है .....