Monday, September 14, 2009

अश्लील मूर्तियाँ/चित्र मंदिर मैं क्यूँ ? Why sexual statue or carvings in Hindu Temple?

हमारे कई मंदिरों मैं अश्लील मूर्तियाँ/चित्र मंदिर के प्रवेश द्वार या बाहरी दीवारों पर अंकित होती हैं | तिरुपति मं भी बिलकुल मुख्य द्वार के ऊपर मिथुन भाव की अंकित मूर्ती देखा तो सहज ही ये प्रश्न दिमाग मैं आया की आखिर हमारे देवालयों मैं अश्लील मूर्तियाँ/चित्र क्यों होते हैं? इधर-उधर बहुत छाना पर इसका वास्तविक और और सही उत्तर मिला मुझे महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र में | वैसे तो बाजार में कामसूत्र पर सैकडों पुस्तक उपलब्ध हैं और लगभग सभी पुस्तकों में ढेर सारे लुभावने आसन चित्र भी मिलेंगे | पर उन पुस्तकों में कामसूत्र का वास्तविक तत्व गायब है | फिर ज्यादातर पाठक कामसूत्र को ६४ आसन के लिए ही तो खरीदता है, तो इसी हिसाब से लेखक भी आसन को खूब लुभावने चित्रों के साहरे पेश करता है | पर मुझे ऐसी कामसूत्र की पुस्तक हाथ लगी जिसमे एक भी चित्र नहीं है और इसे कामसूत्र की शायद सबसे प्रमाणिक पुस्तक मानी जाती है | महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र के श्लोक थोड़े क्लिष्ट हैं, उनको सरल करने हेतु कई भारतीय विद्वानों ने इसपे टिका लिखी | पर सबसे प्रमाणिक टिका का सौभाग्य मंगला टिका को प्राप्त हुआ | और इस हिंदी पुस्तक में लेखक ने मंगला टिका के आधार पर व्याख्या की है | लेखक ने और भी अन्य विद्वानों की टीकाओं का भी सुन्दर समावेश किया है इस पुस्तक में |


एक गृहस्थ के जीवन में संपूर्ण तृप्ति के बाद ही मोक्ष की कामना उत्पन्न होती है | संपूर्ण तृप्ति और उसके बाद मोक्ष, यही दो हमारे जीवन के लक्ष्य के सोपान हैं | कोणार्क, पूरी, खजुराहो, तिरुपति आदि के देवालयों मैं मिथुन मूर्तियों का अंकन मानव जीवन के लक्ष्य का प्रथम सोपान है | इसलिए इसे मंदिर के बहिर्द्वार पर ही अंकित/प्रतिष्ठित किया जाता है | द्वितीय सोपान मोक्ष की प्रतिष्ठा देव प्रतिमा के रूप मैं मंदिर के अंतर भाग मैं की जाती है | प्रवेश द्वार और देव प्रतिमा के मध्य जगमोहन बना रहता है, ये मोक्ष की छाया प्रतिक है | मंदिर के बाहरी द्वार या दीवारों पर उत्कीर्ण इन्द्रिय रस युक्त मिथुन मूर्तियाँ देव दर्शनार्थी को आनंद की अनुभूतियों को आत्मसात कर जीवन की प्रथम सीढ़ी - काम तृप्ति - को पार करने का संकेत कराती है | ये मिथुन मूर्तियाँ दर्शनार्थी को ये स्मरण कराती है की जिस व्यक्ती ने जीवन के इस प्रथम सोपान ( काम तृप्ति ) को पार नहीं किया है, वो देव दर्शन - मोक्ष के द्वितीय सोपान पर पैर रखने का अधिकारी नहीं | दुसरे शब्दों मैं कहें तो देवालयों मैं मिथुन मूर्तियाँ मंदिर मैं प्रवेश करने से पहले दर्शनार्थीयों से एक प्रश्न पूछती हैं - "क्या तुमने काम पे विजय पा लिया?" उत्तर यदि नहीं है, तो तुम सामने रखे मोक्ष ( देव प्रतिमा ) को पाने के अधिकारी नहीं हो | ये मनुष्य को हमेशा इश्वर या मोक्ष को प्राप्ति के लिए काम से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है |


मंदिर मैं अश्लील भावों की मूर्तियाँ भौतिक सुख, भौतिक कुंठाओं और घिर्णास्पद अश्लील वातावरण मैं भी आशायुक्त आनंदमय लक्ष्य प्रस्तुत करती है | भारतीय कला का यह उद्देश्य समस्त विश्व के कला आदर्शों , उद्देश्यों एवं व्याख्या मानदंड से भिन्न और मौलिक है |


प्रश्न किया जा सकता है की मिथुन चित्र जैसे अश्लील , अशिव तत्वों के स्थान पर अन्य प्रतिक प्रस्तुत किये जा सकते थे/हैं ? - ये समझना नितांत भ्रम है की मिथुन मूर्तियाँ , मान्मथ भाव अशिव परक हैं | वस्तुतः शिवम् और सत्यम की साधना के ये सर्वोताम माध्यम हैं | हमारी संस्कृति और हमारा वाड्मय इसे परम तत्व मान कर इसकी साधना के लिए युग-युगांतर से हमें प्रेरित करता आ रहा है –


मैथुनंग परमं तत्वं सृष्टी स्थित्यंत कारणम्
मैथुनात जायते सिद्धिब्रह्म्ज्ञान सदुर्लाभम |


देव मंदिरों के कमनीय कला प्रस्तरों मैं हम एक ओर जीवन की सच्ची व्याख्या और उच्च कोटि की कला का निर्देशन तो दूसरी ओर पुरुष प्रकृति के मिलन की आध्यात्मिक व्याख्या पाते हैं | इन कला मूर्तियों मैं हमारे जीवन की व्याख्या शिवम् है , कला की कमनीय अभिव्यक्ती सुन्दरम है , रस्यमय मान्मथ भाव सत्यम है | इन्ही भावों को दृष्टिगत रखते हुए महर्षि वात्सयायन मैथुन क्रिया, मान्मथ क्रिया या आसन ना कह कर इसे 'योग' कहा है |

Friday, September 11, 2009

विलियम शेक्सपीयर सांप्रदायिक था, क्या?


महान विलियम शेक्सपीयर के लेखन के विभिन्न पहलुओं पर काफी चर्चा हुई है | पर शायद एक ऐसा पहलु  भी है, जिस पर हिंदी जगत मैं बहुत कम चर्चा हुई है | शेक्सपीयर के प्रशंसकों को ये आलेख थोडा अटपटा जरुर लगेगा | जो भी हो, किसी की भावना को ठेंस पहुँचती है तो मैं पहले से ही क्षमा मांग लेता हूँ , पर मेरी गुजारिश है की इसपे गौर जरुर करें |  

किसी लेखक का पूर्वाग्रही और सांप्रदायिक होने नयी बात नहीं | इतिहास के पन्नो मैं आपको कई बड़े विचारक - लेखक पूर्वाग्रही और सांप्रदायिक मिलेंगे, उन्ही लेखकों मैं से एक थे सर विलियम शेक्सपीयर | विश्व प्रसिद्द The Merchant Of Venice नाटक मैं उन्होंने एक पात्र चुना Shylock, निहायत शैतान, निर्दयी और बदला लेने के लिए किसी भी सीमा तक निचे गिरने वाला सूदखोर | Shylock यहूदी (Jew) धर्म का अनुयायी होता है | Antonio एक सहृदय सुन्दर पात्र पर इसाई धर्मावलम्बी | Shylock अपने इसाई मित्र Antonio को उधार मैं पैसे देता है, पर एक वीभत्स शर्त के साथ - Antonio, Shylock को ये अधिकार देता है की यदि Antonio उधार का पैसा वापस नहीं कर पाता है तो Shylock एंटोनियो के ह्रदय से मांस का टुकडा निकाल सकता है | जब दिवालिया घोषित एंटोनियो पैसा वापस नहीं कर पाता है तो Shylock एंटोनियो से शर्त के मुताबिक उसके ह्रदय से मांस का टुकडा माँगता है | ...... इसे लिखते समय आखिर विलियम शेक्सपीयर की मनोदशा क्या रही होगी ? क्यों एक यहूदी पात्र Shylock को इतना क्रूर और इसाई पात्र Antonio को दयालु सहृदय दिखाया ? इस यहूदी पात्र को दयालु और Antonio ( इसाई ) को क्रूर दिखा सकते थे | या कम से कम दोनों ही पात्रों (Shylock और Antonio) को इसाई तो दिखा ही सकते थे ! या फिर वो एंटोनियो और Shylock पात्रों के धर्म को ही छुपा जाते !

आगे देखिये - Shylock की बेटी Jessica, Antonio के मित्र Lorenzo के साथ भागकर इसाई धर्म स्वीकार कर लेती है | 


जब 'The Merchant Of वेनिस' विद्यालयों मैं पढाया जाता है तो यहूदी Antonio के चरित्र बताते समय शिक्षक के चेहरे का भाव कैसा रहता होगा ? शिक्षार्थी के कोमल मन मैं कैसी भावनाएं आती होंगी यहूदी Antonio के बारे मैं ? फिर Jessica का इसाई धर्म स्वीकारना, क्या ये बच्चों को इसाई धर्म के प्रति प्रेम और यहूदी धर्म के प्रति घोर घृणा नहीं सीखा रहा है ?


एक तर्क ये भी दिया जा सकता है की Antonio और Shylock दोनों ही काल्पनिक पात्र हैं | पर क्रूर पात्र Shylock जिसे उन्होंने यहूदी दिखाया - भी तो उनके दिमाग की ही उपज थी ! आगे चलकर उन्होंने यदि किसी यहूदी को सहृदय दयालु बताया हो तो शेक्सपीयर को पूर्वाग्रही सांप्रदायिक कहना उचित नहीं होगा | पर दयालु सहृदय यहूदी पात्र शेक्सपीयर ने दिखाया है तो बताएं .... नहीं तो एक शंका तो मन मैं आती ही है की - शेक्सपीयर वास्तव मैं पूर्वाग्रही सांप्रदायिक था !  


हिटलर ने शेक्सपीयर के इसी क्रूर काल्पनिक पात्र Shylock का प्रचार कर यहूदियों पर अत्याचार किया | इतना ही नहीं २० वीं शताब्दी तक अंग्रेजी भाषा साहित्य मैं यहूदियों (Jews) को कमोबेश Shylock  की तरह ही दुराचारी, व्यभिचारी, लोभी चित्रित किया जाता था |

Wednesday, September 9, 2009

मिरज़ दंगों की असलियत

वैसे तो मैंने कल ही इसी विषय पे एक छोटी सी पोस्ट की थी, पर उसमे दो ही youtube link थे | बाकी के सारे लिंक काफी देर से डाला था तो सोचा की नए लिंक के साथ क्यों ना एक नयी पोस्ट डाल दूँ !  वैसे भी अपनी सेकुलर मीडिया तो इसपे चुप है, जनता को सच से रु-बा-रु कराने का बीडा हम ब्लोग्गरों को ही उठाना पडेगा | TV चैनल्स रोज झूठ को हजारों बार दिखाते हैं, मैंने सत्य को थोड़े विस्तार से दुबारा करने की कोशिश की है | अपने पाठकों से क्षमा भी चाहुगा की ब्लॉग की परंपरा के विपरीत जाकर एक ही विषय पर दुबारा पोस्ट किया है | क्या करें ऐसी घटना पर मीडिया जगत का मौन मन मैं कई शंकाओं को जन्म दे रहा है | youtube विडियो देखने के बाद एक सवाल मन मैं बार बार रहा है - क्या भारत मैं अब हिन्दुओं की भावनाओं का कोई कद्र नहीं ? क्या मिश्र की महान सभ्यता की तरह ही हिन्दू सभ्यता को पतन की ओर धकेला जा रहा है ? 


हिन्दू जागृति ने भी घटना का पूरा विवरण दिया है : http://www.hindujagruti.org/news/7785.html

इसी विषय पे सुरेश जी ने भी विस्तार से लिखा है : http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/09/miraj-riots-ganesh-mandal-mumbai.html

 एक ज्वलंत आलेख अनिल जी ने भी लिखा है : http://anilpusadkar.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html

Tuesday, September 8, 2009

आधिकारिक सरकारी नीति 'तुष्टिकरण' का परिणाम - मिरज दंगा

मिरज (महारास्ट्र) -पुलिस अधीक्षक ने अपने ही पुलिस वाहन पे मुस्लिम दहसतगर्दो को झंडा फहराने की अनुमति दी | कुछ देर के बाद मुस्लिम दहसतगर्दो ने गणपति पंडाल पे हमला बोल दिया | पुलिस ने आनन-फानन मैं टूटी हुई गणपति प्रतिमा का विसर्जन करवाया | ऐसा तो होना ही है जब तुष्टिकरण को आधिकारिक सरकारी नीति बना दिया गया है | youtube link : http://www.youtube.com/watch?v=nsX6LYdNBNw  
http://www.youtube.com/watch?v=o-J0mD8naAg
http://www.youtube.com/watch?v=mCEQBAqkK78
 http://www.youtube.com/watch?v=ib-RvVtQsQc
http://www.youtube.com/watch?v=Ut7HebM1Eck
http://www.youtube.com/watch?v=GsXGL6HWskU
http://www.youtube.com/watch?v=gQq0-ZEGLZ4



पूरी रिपोर्ट विस्तार से आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं : http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/09/miraj-riots-ganesh-mandal-mumbai.html
IMPORTANT NOTE : हो सकता है भारत सरकार ने इनमें से कुछ वीडियो को प्रतिबन्धित करने की कोशिश की हो |

Thursday, September 3, 2009

पैगम्बर मुहम्मद कल्कि अवतार नहीं - स्वच्छता वाले सलीम मियां को जवाब


सबसे पहले ये बता दूं की ये लेख मैंने क्यूँ लिखा? हिंदी ब्लॉग जगत मैं डॉ. जाकिर के चेलों (स्वच्छता वाले सलीम खान) द्वारा लगभग हर सप्ताह एक दो ब्लॉग "पैगम्बर मुहम्मद ही कल्कि अवतार हैं" लिखते रहे हैं | हमने कई जवाब भी दिए पर वो कहाँ सुननेवाले ! गूगल पे हिंदी मैं सर्च करो तो वही स्वच्छता वाले (वास्तव मैं अस्वच्छ) सलीम खान ही सबसे आगे आते हैं और उसका कोई सही जवाब देता हुआ ब्लॉग नहीं मिला | इसलिए सोचा के झूठे प्रचार का जवाब देना ही चाहिए | मैं संस्कृत का ज्ञानी नहीं इसलिए संस्कृत शब्दों और श्लोकों के अर्थ के लिए उचित reference देने की कोशिश की है |

क्या पैगम्बर मुहम्मद कल्कि अवतार हैं ? उत्तर : नहीं, निम्न बिन्दुओं पे गौर करें :

* हिन्दू धर्म ग्रंथों मैं कलि युग का काल ४,३२,००० (चार लाख बत्तीस हज़ार वर्ष) बताया गया है | कलि युग के अंत मैं ही भगवान् स्वयेम कल्कि के रूप मैं पृथ्वी पे अवतार लैंगे (ref: भागवतम 2.7.३८ -
http://srimadbhagavatam.com/2/7/38/en ) | कलि युग का आरम्भ लगभग 3102 BC माना गया है (ref : http://www.harekrsna.com/sun/features/04-09/features1345.htm) | अब तक कलि युग के लगभग पॉँच हज़ार वर्ष ही बीते हैं, कल्कि अवतार आने मैं अभी लाखों वर्ष बाकी हैं | क्या यहीं ये साबित नहीं हो जाता की मुहम्मद साहब कल्कि अवतार हैं ही नहीं !

* डॉ. जाकिर और अन्य मुस्लिम विचारक जिन हिन्दू धर्म ग्रंथों का सन्दर्भ दे रहे हैं, उन्ही ग्रंथों में राम, कृष्ण.... को साक्षात भगवन का अवतार बताया गया है | क्या हमारे मुसलमान भाई कल्कि अवतार से पहले की अवतारों (राम, कृष्ण....) को भगवान् मानते हैं ? ये प्रश्न जैसे ही पूछता हूँ इनके बड़े-बड़े विचारक बेशर्मी से कहते हैं, नहीं हम तो सिर्फ मुहम्मद साहब को ही अवतार मानते हैं और इससे पहले की सारे अवतार झूठे हैं | मतलब की आप हमारे मुहम्मद साहब को कल्कि अवतार मान कर इस्लाम कबुल कर लो, हम तो आपके अवतारों राम, कृष्ण ... को मानते भी नहीं !!! अब बताईये इस्लाम के बड़े-बड़े विचारकों को क्या कहा जाए ?

* भागवतम (12.2.१७ -
http://srimadbhagavatam.com/12/2/17/en) कहता है : भगवान् विष्णु खुद कल्कि के रूप मैं धरती पे अवतार लेंगे | मतलब भगवान् विष्णु = कल्कि अवतार | पर डॉ. जाकिर और उनके चेले कहते हैं की मुहम्मद साहब तो पैगम्बर हैं, अल्लाह कोई और है | जबकी हिन्दू ग्रन्थ साफ़ कहता है : कल्कि अवतार कोई पैगम्बर नहीं बल्कि भगवान् विष्णु का अवतार होगा | एक कम बुद्धि वाला इंसान भी ये बात भली भांती समझता है, फिर डॉ. जाकिर और सलीम भाई जैसे इस्लाम जगत के बड़े विद्वानों ने क्यों नहीं समझा इसे अबतक? समझेंगे भी कैसे इनके पथ निर्देशक खुद ही गलत रास्ते पे जो दौड़ रहे हैं |

* कई जगहों पे वेदों का उदाहरण दे कर कहते हैं की वेदों मैं मुहम्मद साहब के बारे मैं फलां-फलां बातें बतायी गई है | वस्तुतः वेदों मैं कुल १,००,००० (एक लाख) ऋचाएं/मन्त्र थी , घटते घटते आज सिर्फ २०-२१ हजार ही उपलब्ध रह गई हैं | एक पढ़ा-लिखा इंसान (भले ही उसे कितनी भी अच्छी संस्कृत क्यों ना आती हो) इन २०-२१ हजार रिचाओं को अपने बल बूते नहीं समझ सकता, ये ग्यानी जन कह गए हैं | वेदों को समझने के लिए गुरु-शिष्य परम्परा आवाश्यक है | शायद यही कारण है की वेद कभी गीता, महाभारत, रामायण या अन्य पुराण की तरह आम जन के लिए सहज उपलब्ध भी नहीं हुआ और ना ही इसे ऐसे पढा जाता है |
डॉ. जाकिर और उनके चेलों (स्वच्छता वाले सलीम मियां) से ये पूछना चाहता हूँ की आपने वेद के २०-२१,००० ऋचाएं बिना गुरु (कोई गुरु हो तो बताएं) के ही पढ़ कर समझ भी लिया वो भी ४-५ वर्षों मैं ही ? आपके कुरान मैं लगभग ६२३६ आयात ही हैं, तो आपने कुरान से कई गुना ज्यादा समय वेद पढने मैं लगाया , वाह क्या बात है ? अब जबकी मुस्लिम विद्वान् हिन्दू ग्रन्थ पढने मैं ज्यादा समय देते हैं तो कोई पागल हिन्दू ही इनके कुरान को पढ़ेगा, क्यूँ ?

* वेद के किसी भी मन्त्र मैं मुहम्मद शब्द का उल्लेख तक नहीं है, फिर भी बड़े बेशर्मी से ये कहते हैं नराशंस शब्द का अर्थ मुहम्मद और अहमद है | नराशंस शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए youtube लिंक देख सकते हैं :
http://www.youtube.com/watch?v=AHOv-v-EfkE | जाकिर और उनके चेलों (सलीम खान) के हिसाब से संस्कृत के बड़े बड़े पडित - ज्ञानी किसी को संस्कृत नहीं आती, सबसे बड़े ज्ञाता तो सलीम मियां और जाकिर नायक हैं !

* पैगम्बर मुहम्मद पे भविष्य पुराण क्या कहता है जानने के लिए गूगल मैं search करें, अंग्रेजी मैं ढेर सारी सामग्री मिल जायेगी | bhavishyapuran नाम से (शायद) एक ब्लॉग भी है जहाँ इसपर सामग्री उपलब्ध है |

स्वच्छता वाले सलीम भाई के गुरु डॉ. ज़ाकिर नायक के बारे मैं कुछ मुसलमान भाई क्या राय रखते हैं, देखने के लिए youtube लिंक पे क्लिक करें
youtube लिंक
http://www.youtube.com/watch?v=JL52VoKUj78 - (NDTV रिपोर्ट )


(इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेश पहुचाना नहीं अपितु डॉ. जाकिर और अन्य मुस्लिम भाईयों (स्वच्छ हिंदोस्ता वाले सलीम खान, और ना जाने कौन कौन ..) द्वारा कल्कि अवतार पे किये जा रहे झूठे प्रचारों से लोगों को अवगत करना है | )
 

Tuesday, September 1, 2009

८२३ वर्षों बाद - अगस्त २००९ एक अद्भुत माह |


AUG
AUG
AUG
AUG
AUG
DATE
DAY
DATE
DAY
DATE
DAY
DATE
DAY
DATE
DAY
1
SAT
8
SAT
15
SAT
22
SAT
29
SAT
2
SUN
9
SUN
16
SUN
23
SUN
30
SUN
3
MON
10
MON
17
MON
24
MON
31
MON
4
TUE
11
TUE
18
TUE
25
TUE
5
WED
12
WED
19
WED
26
WED
6
THU
13
THU
20
THU
27
THU
7
FRI
14
FRI
21
FRI
28
FRI
२००९ अगस्त मैं
५ शनिवार
५ रविवार
५ शोमवार
एक ही महीने मैं ! ऐसा ८२३ वर्षों मैं एक बार ही होता है |

Friday, August 28, 2009

जीजस की जय - क्रिश्चियन मिसनरी के नायाब नुख्से



खर्र .... खर्र .... खुट.... एक कॉन्वेंट स्कूल का बस चलते - चलते अचानक रुक जाती है | शायद कोई तकनिकी गडबडी हो !

ड्राईवर जोसफ बस को स्टार्ट करने का प्रयास कर रहा है .. खर्र .... खर्र .... खुट.... लेकिन बस स्टार्ट नहीं होता |

अब सिस्टर मेरी बच्चों को संबोधित कर कहती है, बच्चों बस तो स्टार्ट नहीं हो रही है चलो तुमलोग अपने भगवान् का नाम लो ... "राम भगवान् की जय ... राम भगवान् की जय ... राम भगवान् की जय ...."

बस स्टार्ट करने की कोशिश फिर से की जाती है .. राम भगवान् की जय ... खर्र .... खर्र .... खुट..... बस स्टार्ट नहीं होती है |

सिस्टर मेरी - "बच्चों लगता है भगवान् राम ने हमारी सहायता नहीं की .. कोई बात नहीं अब जीजस की जय बोल कर देखते हैं, बोलो जीजस की जय .. जीजस की जय .. जीजस की जय .. जीजस की जय .."

जोसफ फिर से बस स्टार्ट करता है " जीजस की जय .... " बस स्टार्ट हो जाती है |

सिस्टर मेरी - "देखा बच्चो जीजस ने मुसीबत के समय कैसे हमारी सहायता की .. फिर से बोलो जीजस की जय .." बस सुरक्षित स्कूल पहुँच गया ...

बच्चे खुस... की जीजस ने सहायता कर हमारी बस स्टार्ट कर दी ..

सिस्टर मेरी और जोसफ शहर के मुख्य पादरी के पास जाकर पूरी घटना सुनाते हैं | THE BOSS SAYS WELL THAT WAS A GOOD JOB. NEXT YEAR YOUR SALRY WILL RISE, BECAUSE YOU DID A GREAT SERVICE TO THE LORD (हिंदी मैं - पादरी साहब कहते है , तुमलोगों ने अच्छा काम किया है | अगले साल तुमलोगों का वेतन बढ़ा दिया जाएगा | तुमलोगों ने गोड जीजस के लिए महान कार्य किया है )

Thursday, August 20, 2009

एक विकराल समस्या


मैं झारखण्ड (घाटशिला, जमशेदपुर) से हूँ, और मैंने बहुत करीब से क्रिश्चियन मिसनरी की घिनौनी करतूत देखी है | घाटशिला के निवर्तमान विधायक प्रदीप बालमुचू ने पिछले १५ वर्षों मैं सैकडों चर्च बनवाने मैं सहायता की है, और लाखों लोग हिन्दू से क्रिश्चियन मैं convert हुए हैं | कारण साफ़ है प्रदीप बालमुचू खुद ही क्रिश्चियन हैं (नाम पे मत जाइये) और उनको अपने देश की सर्वशाक्तीशाली महिला का वरदहस्त प्राप्त है | खैर ये तो एक छोटा सा उदाहरण है, जो मैंने अपनी आँखों से देखी है | हमारी आँखों के सामने ये सब हो रहा है और हम कुछ नहीं कर पा रहे | ज्यादातर लोग ये मानाने को तैयार ही नहीं की conversion इस स्तर पे हो रहा है, वो अपनी आँखें बंद कर बैठे हैं | कुछ लोग मानते भी हैं तो कहते हैं हिन्दुओं की गरीबी ही इसका एक मात्र कारण है | जब पूछता हूँ की क्या हमारे मुसलमान भाई हिन्दुओं से कम गरीब है, फिर वो क्यों नहीं Christianity को अपनाते ? एक तर्क ये भी दिया जाता है की क्रिश्चियन बनने मैं बुराई क्या है, सभी धर्म तो एक इश्वर को ही मानता है ? इसके उत्तर के लिए धर्म परिवर्तन क्यों , को समझना जरुरी है | धर्म इश्वर को पाने का एक मार्ग है, हिन्दू धर्म मैं रहते हुए क्या कभी गंभीरता से इश्वर को प्राप्त करने की चेष्टा की ? क्या हमने ये चेष्टा सिर्फ मंदिर जाकर पूजा-पाठ करने तक ही सिमित नहीं रखा ? क्या इश्वर प्राप्ति के लिए यही पर्याप्त हैं ? बिना सच्ची ज्ञान-भक्ती के इश्वर नहीं मिलने वाला चाहे तो कितना भी धर्म बदला जाए | लगभग ९९.९९% स्थितियों मैं धर्म परिवर्तन करने वालों को पता ही नहीं होता, उसे तो ये बताया जाता है की मंदिर छोड़ कर चर्च जाने भर से ही इश्वर की प्राप्ती हो जायेगी | और बाजार वाद का फंडा - " there is great offer going on, if you embrace Christianity now, you will get many free items - education, food, cloth, money, security... ". क्या ऐसा धर्म परिवर्तन जायज है ? कल को ये भी कहा जा सकता है की " change your religion you will get free tickets & nights with ..... in las vegas".

ऐसा नहीं है की भारत मैं धर्म परिवर्तन ही एक मात्र समस्या है; गरीबी, अशिक्षा ... भी बड़ी समस्या है, जिसे सबों ने समस्या माना है और इस पे हमेशा चर्चा भी होती है | सरकार ने कई कदम उठाये हैं, हालांकी ज्यादातर असफल ही रहे हैं | फिर भी सरकार ने ये माना तो है और कुछ कदम (अपर्याप्त हे सही) उठाये तो हैं | पर धर्म परिवर्तन, संस्कृति पे वार को सरकार समस्या तक नहीं मान रही है, इसके खिलाफ कदम उठाना तो दूर की बात है | जब सरकार ही पिछले दरवाजे से धर्म परिवर्तन को बढावा दे तो क्या कहें | क्रिश्चियन मिसनरी के लिए तो बल्ले-बल्ले है - सैया भये कोतवाल अब डर काहे का ! आज की मीडिया का हिन्दू सभ्यता संस्कृति विरोधी चेहरा तो किसी से छुपा नहीं| इन परिस्थितियों मैं सारा भार धर्म एवं सभ्यता-संस्कृति के रक्षकों के कंधे पे ही आ गया है| आज की परिस्थितियाँ हिन्दुओं को निराशा करती है, पर निराश हो जाने भर से हमें अपने दायित्वों से छुटकारा नहीं मिलने वाला | इतिहास गवाह है महापुरुषों, ऋषियों ही नहीं वरन भगवान को भी धर्म - संस्कृति की रक्षा हेतु हमेशा संघर्ष करना पडा है | क्या हम महापुषों, ऋषियों या भगवान से भी बड़े हो गए जो हमें संघर्ष करना ही न पड़े ? या phir हम इतने बड़े और माडर्न हो गए की धर्म - संस्कृति की रक्षा को छोटा काम मानाने लगे ? जरुरत है अपने को मजबूत बना कर रखने का, ताकि ये दायित्व हमें बोझ ना लगे| कई मौके पे हम कह बैठते हैं भगवान हमसे रूठे हैं तभी तो इस संकट काल (कलि युग) मैं हमने जन्म लिया | आज का समय संकट का है, इसमें कोई दो राय नहीं | पर मैं ये नहीं मानता की भगवान की कृपा हम लोगों पे नहीं है | संकट उबारने के लिए हमेशा विश्वासपात्र को ही भेजा जाता है, तो ऐसा क्यों नहीं समझें की भगवान के हम विश्वासपात्र हैं, तभी तो इस संकट काल मैं उन्होंने हमें चुन कर भेजा है ! अब भगवान के विश्वास पात्र बने रहना है या विश्वाशाघाती ये तो अपने ऊपर है |

कई बुद्धिजीवी धर्म एवं सभ्यता-संस्कृति पे आए संकट को ब्लॉग जगत (सिर्फ ब्लॉग जगत पे ही ) अपनी लेखनी का विषय बना रहे है| इनकी सराहना भी की जाती रही है | पर "आपने बहुत अच्छा लिखा है ..." जैसी टिपण्णी भर देकर हम ये समझ बैठते है की हम अपना दायित्व बखूबी निभा रहे हैं| और कई तो ऐसे हैं जो अपने आप को सेकुलर दिखने के चक्कर मैं टिप्पणी भी नहीं करते | ब्लॉग पे आलेख और टिप्पणी से आगे बढ़ कर कार्य करनी की आवश्यकता है आज के समय मैं | अपने भी इर्द-गिर्द ऐसे सैकडों घटना घट रही हैं जहाँ हमारे योगदान की सख्त आवश्यकता है | ये योगदान विरोध के रूप मैं भी हो सकता है | विरोध लाठी डंडे से ही नहीं होता, नम्र बन कर भी विरोध प्रकट किया जा सकता है| एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था जहाँ रामायण की खिल्ली उडाई जा रही थी, मैं गुस्से मैं आ कर कुछ बोलने ही वाला था की तभी एक संभ्रांत सज्जन ने बड़े विनम्रता से आयोजकों को कहा की आप ऐसा कर हमारी भावना को ठेष पहुचा रहे हैं और मैं इसके लिए अदालत भी जा सकता हूँ | उसी क्षण आयोजकों ने माफ़ी मांग कर कार्यक्रम को रोक दिया | जरा सोचिये हम सभी सिर्फ साहस कर गलत का विरोध प्रकट करने लगें तो क्या स्थिति ऐसी ही बिगड़ी रहेगी?

भगवन कृष्ण ने जब गोवर्धन पर्वत उठाया था उनके साथ साथ सभी ग्वाल-बाल लाठी से ठेक लगाए थे | क्या ग्वाल-बाल की लाठी से ही पर्वत उठा था, नहीं उन्होंने तो बस अपना कार्य किया था| वैसे ही आज भी हमें अपना धर्म सेवा का कार्य इमानदारी से करना है, बाकी तो भगवान हमारे साथ हैं ही |

सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं
कोशिश है की सूरत बदलनी चाहिए | - दुष्यंत कुमार

ये भजन मुझे हमेसा ऊर्जा देता है, आपको भी सुनाते हैं | youtube लिंक (निचे दिया गया है) मैं चार क्षंद ही हैं, अंत की ५ मैंने अपनी तरफ से जोड़े हैं :
कौन कहते हैं भगवान आते नहीं
तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान खाते नहीं
बेर सबरी के जैसे खिलाते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान सोते नहीं
मा यशोदा के जैसे सुलाते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान नाचते नहीं
गोपियों की तरह तुम नचाते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान देते नहीं
सुदामा के जैसे तुम मांगते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान रास्ता दिखाते नहीं
सुर (दास) के जैसा तुम पुकारते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान दिल मैं रहते नहीं
हनुमान जैसे दिल मैं तुम बसाते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान सखा बनते नहीं
अर्जुन जैसा उन्हें तुम मनाते नहीं |

कौन कहते हैं भगवान रक्षा करते नहीं
प्रहलाद जैसी भक्ती तुम करते नहीं |