Wednesday, October 7, 2009

सावधान : शंकराचार्य की अपील - कुरान बांटों और इस्लाम कबुल करो !!!

मैं बकवास कर रहा हूँ, ऐसा सोचने से पहले कृपया कर आप ये यू ट्यूब विडियो देख लीजिए : 

 

अब तो विश्वास हुआ? जब मुझ पर विश्वास हुआ है तो पुरी पोस्ट पढ ही लीजिये | इस विडियो को लगभग २ लाख २० हज़ार बार देखा गया है | और मेरा अनुमान है की कम से कम ४-५% हिन्दुओं ने (मुस्लिम तो शायद ७०%) इसे सच ही माना होगा | डॉ. जाकिर नायक जैसे लोग इन्ही ४-५% लोगों को इस्लाम काबुल करवाने का टारगेट बनाते हैं | जब ८-१० हज़ार लोग जो ये इस प्रकार के विडियो को सच मान लेते हैं, उसमे से कम से हज़ार दो हज़ार तो इस्लाम काबुल कर ही लेते होंगे | यही तो डॉ. जाकिर और उनके चेलों का उद्देश्य है |


जब हमारे शंकराचार्य ही कुरान का प्रचार कर रहे हैं तो हम भी कुरान की सरण में चलें, क्यों? चलिए लगे हाथों ये भी बता दूँ कि ये शंकराचार्य नकली हैं | ये विडियो भी देख ही लीजिए: 






हिन्दुओं के साथ ये धोखा किया है (और आगे भी करते रहेंगें), इस्लाम के जानेमाने विद्वान ज़ाकिर नायक ने | ज़ाकिर नायक या नकली बाबा ने ये नहीं बताया की किस मठ के शंकराचार्य हैं ये? वैसे ढेर सारे लोगों ने भी जाकिर नायक को खुली चुनौती दी है की बताएं ये ढोंगी किस मठ के शंकराचार्य हैं और जिसका जवाब आज तक ज़ाकिर साहब ने नहीं दिया है | ज़ाकिर साहब जवाब देने से हिचकिचा रहे हैं, चलिए मैं ही बता देता हूँ | ये गेरुआ वस्त्र पहना ढोंगी कोई और नहीं बल्कि ज़ाकिर नायक के मदरसे के शंकराचार्य हैं | मदरसे भी अब शंकराचार्य बनाने लगे हैं, ज़ाकिर नायक ने मदरसे मैं क्रांति ला दी है | इस क्रांति पे आप कुछ कहना चाहेंगे?  

As usual our secular brothers will call me wrong or keep quiet. Oh, I fogot seculars may also say Fake Sankaracharyaa is right.  

नोट: अंग्रेजी मैं लिखने के लिए क्षमा चाहूँगा, क्या करूँ सेकुलर ज्यादातर विदेशी भाषा प्रिय है तो उन्हें अंग्रेजी ज्यादा अच्छी समझ मैं आएगी | 

क्षमा चाहूँगा यदि किसी बंधू ने इस विषय पे पहले ही पोस्ट की हो | पर मुझे लगता है कि हर महीने - दो महीने मैं इसपे एक आलेख आना चाहिए | 

Sunday, October 4, 2009

हमास प्रायोजित शादी, क्या ऐसा होता है?

तस्वीरों को देख अनुमान लगाईये, इन मासूम बच्चियों का हाथ किसने पकड़ रक्खा है ? शायद बाप, चाचा, बड़ा भाई, या कोई और सम्बन्धी ही होगा ..., नहीं ... ये रिश्ता कोई और है | १० वर्षों से भी कम उम्र कि लड़कियों का हाथ पकडे कोई और नहीं बल्कि उसका दुल्हा है, जी हाँ | क्या अब भी तस्वीरें खुबसूरत लग रही हैं?




ये सारी तस्वीरें गाजा मैं उस हमास (Islamic Resistance Movement) प्रायोजित विवाह समारोह से ली गई हैं जिसमे ४५० जोडों की शादी कराई गई (अगस्त २००९) | हमास नेता महमूद जहार ने खुद ही दूल्हा-दुल्हन जोड़ी को बधाई दी | हमास की तरफ से हर दुल्हे को $500 (५०० डालर) और दुल्हन को white gown भेंट किया गया |

हमास नेता इब्राहिम सलाफ के मुताबिक - "हमास की तरफ से ये शादी का उपहार उन वीर जवानों के लिए है जो इस्राईल के खिलाफ युद्ध मैं बहादुरी से लड़े हैं" |  

यू ट्यूब विडियो लिंक : http://www.youtube.com/watch?v=RYmtaXQHEtw  

International Center for Research on Women का अनुमान है की लगभग ५ करोड़ child brides दुनिया के सभी देशों मैं हैं, जिसमे ज्यादातर देश इस्लामिक देश ही हैं | 

नोट : क्या इस तरह की खबरों को ब्लॉग का विषय बनाया जाना चाहिए? ये प्रश्न तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब ये देखता हूँ की आज की मीडिया मैं इसे खबर नहीं के बराबर आती हैं | आपकी राय महत्वपूर्ण है |

Wednesday, September 30, 2009

ब्लोगवाणी पे आरोप लगाने वालों के लिए प्रश्न


किसी पे आरोप लगाने से पहले पूरी पड़ताल कर लेनी चाहिए | मुझे लगता है कि जिस ब्लॉग के पोस्ट पर ब्लोगवानी बंद कि गई थी वो आलेख पूरी पड़ताल के बिना ही लिखी गई है | इसे समझाने के लिए ब्लोग्वानी प्रकरण से हट कर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ :

* पिछले वर्ष गूगल से checkout करने पर $10 का discount मिलता था (one time only). मैंने अपने account से एक के बजाय २-3 transactions किया और सभी successful रहे और टोटल $30 का discount मुझे मिला, जबकि गूगल साफ़ कहता था ONLY ONE DISCOUNT WILL BE GIVEN (per a/c) | लगभग उसी समय मेरे साथी ने पहली बार google checkout try किया और उन्हें कोई discount नहीं मिला | और ऐसा कईयों के साथ हुआ था |  

अब आरोप लगाने वालों के हिसाब से सोचे तो google मेरे पे मेहरबान और मेरी साथी पे दुश्मनी उतार रहा था, आप क्या कहेंगे इसपे ?  

* और एक उदहारण देता हूँ इसी वर्ष microsoft - ebay cashback मैं कईयों को आसानी से discount मिला तो किसी का valid transaction होने के बावजूद कोई कैश बेक नहीं |  

क्या कहें की माइक्रोसॉफ्ट कुछ लोगों से दुश्मनी निकाल रहा है?  

* मेरे ब्लॉग पे कोई भी टिप्पणी आती है तो मुझे इ-मेल आती थी, अभी कुछ दिनों से किसी टिप्पणी पे इ-मेल आती है किसी पे नहीं |

क्या कहें google मुझसे पक्षपात कर रहा है?

आरोप लगाने वालें ने ये भी लिखा है कि किसी खास विचारधारा वालों की पसंद बढती रहती है | मैंने तो सलीम भाई के पोस्ट पे पसंद ज्यादातर ऊँची ही देखि है, हालाँकि कमेन्ट गिने चुने (२-४) होते हैं पर पसंद मैं आगे रहते हैं | कंप्यूटर का जानकार ये समझ सकता है कि पसंद कैसे उंचा रखा जा सकता है | यहाँ तो मुझे ये समझ मैं नहीं आया कि सलीम भाई कि बात कर रहे हैं या किसी और की, खुल के बताया तो नहीं है |

मेरी राय मैं कोई भी प्रोग्राम १००% परफेक्ट नहीं होता, खासकर web based प्रोग्राम तो नहीं ही | कई बार cookies, trojans, proxy, DHCP.... आदि से ऐसा कमाल और गोल-माल होता है की क्या बताऊँ | वैसे गूगल मैं सर्च करके भी थोडी बहुत जानकारी इसपे हासिल कर सकते हैं | ब्लोग्वानी पे जो आरोप उन्होंने लगाया है उसपे एक software programmer हंसेगा ही | हाँ आरोप लगानेवालों ने यदि ब्लोग्वानी के सारे सिक्यूरिटी पॉलिसी और प्रोग्राम को चेक करवाने के बाद ये सब आरोप लगाये होते तो मैं या एक सॉफ्टवेर का जानकार आरोप लगानेवाले का समर्थन कर सकता था | पर ऐसा तो उन्होंने किया ही नहीं, तो उनके आरोप की मिथ्या क्यों ना कहा जाए ?

और भी कई चीजें हैं जिसका उल्लेख नहीं किया है | आशा है पठाक और आरोप लगाने वाले मेरे विचार को अन्यथा नहीं लेंगे ... मैंने वही लिखा है जो सच है ... ब्लोग्वानी से मेरा कोई दूर-दूर तक का रिश्ता नाता नहीं है (सिवाय ब्लॉग लेखन के) | मेरा पिछ्ला पोस्ट देख सकते हैं, मैंने ब्लोग्वानी के बदलाव पे भी कई शंकाएँ जताई है |

वैसे भी हम भारतीय लोग किसी अच्छा काम करनेवालों की टांग खिचाई करने मैं पीछे नहीं रहते !

Tuesday, September 29, 2009

ब्लोगवाणी का बदलाव - कई गलत चीजों को जन्म देने वाला है !

सबसे पहले ब्लोग्वानी प्रारंभ करने के लिए धन्यवाद और अपना आभार प्रकट करता हूँ ! इसके साथ साथ ब्लोग्वानी मैं जो बदलाव की बात की है उसपे चर्चा होनी ही चाहिए | और मुझे लगता है कहीं ऐसा ना हो की बदलाव गलत चीजों को जन्म दे दे. मैंने अपनी शंका निचे के शब्दों मैं रही है, शायद कई अन्य लोगों की शंका भी ऐसी ही हो  

BLOGVANI 1. ब्लागवाणी के प्रयोक्ता ही यह फैसला करेंगे कि कौन सा ब्लाग जोड़ना है और कौन सा छोड़ना.  
मेरी शंका : यहाँ पर शायद आप वोटिंग सिस्टम की बात कर रहे हैं | वोटिंग सिस्टम यहाँ फुल प्रूफ़ होना चाहिए | यहाँ ऐसा भी हो सकता है की वोट की संख्या के आधार पे कई बेहतरीन आलेख ब्लोग्वानी से जुड़ ही नहीं पाए | और आप तो शायद जानते ही हैं की हिंदी ब्लॉग्गिंग मैं किसी गंभीर विषय पे कितना भी अच्छा आलेख क्यों नहीं आया हो, टिप्पणी बहुत कम आते हैं| लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं ही होना चाहिए की गंभीर चर्चा वाले आलेख प्रकाशित (पोस्ट) ही ना हो?|  

BLOGVANI 2. सिर्फ ब्लागवाणी के सदस्य ही पसंद कर सकेंगे और यह सब देख सकेंगे कि पसंद किसने की थी ताकी .... हां यह जरूर है कि अब पसन्द/नापसन्द के साथ अनोनिमिटी नहीं रहेगी. यह शायद एक जरूरी पैनल्टी है.  
मेरी शंका : ब्लोग्वानी पे आने वाले हर कोई registered user नहीं होता और हो भी नहीं सकता | मैंने कुछ ऐसे भी लोग देखे हैं जो सीधे ब्लोग्वानी पे आकर लेख पढ़ कर चलते बनते हैं, वो कोई टिप्पणी भी नहीं करते | अब यदि एक पाठक (ब्लॉग लेखक नहीं) को आलेख अच्छा लगा तो वो अपनी पसंद ब्लोग्वानी पे दर्ज नहीं कर सकता |  

BLOGVANI 3. पसंद के साथ ही नापसंद भी लाया जायेगा जिसका प्रयोग भी सिर्फ ब्लागवाणी के सदस्य कर सकेंगे |  
मेरी शंका : हम भारतीय positive बातों के लिए एक जुट नहीं होते पर negative बातें हमें तुंरत एक जुट कर देती हैं | और यदि आपने नापसंद को जोड़ा तो एक ग्रुप बनाकर किसी के आलेख के वास्तविक पसंद को निचे ले आयेंगे | विश्वास कीजिये ये होगा ही | मैं सॉफ्टवेर industry मैं हूँ और पिछले १२ वर्षों से अलग अलग सिस्टम पे काम कर चुका हूँ | कई बड़ी बड़ी कंपनियों के प्रोजेक्ट्स पे काम किया हूँ अभी भी एक बड़ी कंपनी का प्रोजेक्ट्स ही देख रहा हूँ | कोई भी सॉफ्टवेर या प्रोग्राम १००% perfect नहीं हो सकता (including NASA, pentagon, Sony, Nintendo etc....). हेकर्स जब पेंटागन, सोनी, Nintendo और ना जाने कितने के चिप डिजाईन सिक्यूरिटी तक को समय समय पे धता बताते रहते हैं | इस हिसाब से क्या आपको लगता है की नापसंद का गलत उपयोग नहीं किया जायेगा ?  

आये दिन हिंदी ब्लॉग मैं व्यक्तिगत विवाद चलता रहता है और दो ग्रुप बन जाता है | उदाहरण देखिये - संगीता पूरी team vs प्रवीन जाखड team | अब इस अवस्था मैं एक ग्रुप वाले दुसरे ग्रुप वाले के आलेखों को नापसंद ही करेंगे |  

समय समय पर किसी भी सिस्टम मैं आवश्यक सुधार और बदलाव होना ही चाहिए, ब्लोग्वानी मैं भी ऐसा ही होना चाहिए | पर बदलाव से पहले उसके सारे positives & negatives पे अच्छी तरह चर्चा जरुर होनी चाहिए | किसी के आलोचना भर से ही डरकर या उन्हें कुछ दिखाने के लिए बदलाव को वास्तविक बदलाव नहीं बल्कि एक emotional भूल ही कही जायेगी | और ब्लोग्वानी के बदलाव का आधार ही इमोशनल दिख रहा है | 

परिवर्तन करना ही है तो पहले मन शांत कर लें, फिर लगभग एक-दो महीने बाद नए सिरे से सोचें की ब्लोग्वानी और हिंदी ब्लॉग्गिंग के भविष्य के लिए क्या बदलाव आवश्यक हैं | अभी तो मन अशांत ही दिख रहा है, और इस अशांत वातावरण मैं शुभ कार्यों का श्रीगणेश उचित नहीं लगता | आशा है ब्लोग्वानी की टीम इस दिशा मैं ध्यान देगी और समय रहते उचित फैसला करेगी | धन्यवाद !

Sunday, September 27, 2009

माँ : बेटा लड्डू खा लो ...


माँ : बेटा लड्डू खा लो ...

माँ : बेटा राजीव ये लड्डू खा लो, हनुमान जी का प्रसाद है |

राजीव : माँ मैंने कितनी बात तुम्हें कहा है कि मुझे मीठा बिलकुल पसंद नहीं, फिर क्यों मुझे बार-बार लड्डू खाने को कहती हो ?

माँ : ये तो भगवान का प्रसाद है बेटा | पूरा लड्डू ना सही आधा या एक टुकडा ही खा लो |

राजीव : नहीं मीठा खा ही नहीं सकता | इसे किसी और को खिला देना या phir भिखारी को दे देना |
........
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कुछ दिनों पश्चात राजीव अपनी पत्नी और पुत्र रोकी के साथ एक बर्थ डे पार्टी मैं ...  

यार राजीव today's cake is great, तुम नहीं खाओगे क्या? राजीव : जरुर, अभी खाता हूँ ..... this is really good. Can I have some more?.....  

अब राजीव का बेटा मनीष अपने पिता से पूछ बैठता है | पापा आपने तो दादी जी को कहा की आपको मीठा बिलकुल पसंद नहीं | फिर ढेर सारा केक कैसे खा गए ? 

राजीव : बेटा ... यदि मैं केक ना खाता तो उन्हें बुरा लग जाता इसलिए केक खा लिया ....

Thursday, September 24, 2009

केहुनी-मिलन (elbow shake) - Swine flu से बचने का तरिका ?


बच्चे के रूटीन चेकउप के लिए आज डॉक्टर के पास गया | डॉक्टर ने हाथ मिलाने (hand shake) के बजाय अपनी केहुनी (elbow) आगे बढा दी | एक क्षण को अवाक रह गया की डॉक्टर साहब ये क्या कर रहे हैं, कहीं मुझसे कोई पुराना हिसाब-किताब तो चुकता करने के मुड मैं तो नहीं आ गए? मुझको अवाक देख उन्होंने कहा - give me your elbow. मैंने संकोच करते-करते शिष्टाचारवस ही सही अपना केहुनी (elbow) उनकी केहुनी से सटा तो दी | पर मन मैं एक नई आशंका ने जन्म ले लिया ...कहीं ये इलू-इलू वाला तो नहीं... क्या मैं ऐसा दिखता हूँ कि एक पुरुष डॉ. मुझसे ... छि-छि ... | हिम्मत कर, डॉ. साहब से पूछ ही लिया ये elbow-elbow क्या था, ...? बड़े प्रेम से उस अमेरिकन डॉ. ने elbow-elbow का अर्थ इस प्रकार समझाया :

* It is the newly suggested and advisable way of greeting people rather than handshakes. (हाथ मिलाने की अपेक्षा ये लोगों का सत्कार करने का एक नया और सुझावित तरिका है ) * Swine flu और अन्य कई संक्रामक बिमारी से बचने का एक कारगर/सुरक्षित तरीके के रूप मैं इसका इस्तेमाल अमेरिका, यूरोप .. आदि देशों मैं किया जाने लगा है |                                तो भाई अब यदि भारत मैं कोई आपसे केहुनी-मिलन (elbow shake) करना चाहे तो चौकियेगा नहीं | क्या पता भारत मैं भी केहुनी मिलन का प्रचलन आरम्भ हो गया हो और हमें पता ही नहीं ! वैसे भी अपन देशी लोग तो आँख मुंद कर कॉपी करने मैं माहिर हैं | चेतावनी : भूल से भी अपनी केहुनी किसी आर्जेन्टिना वालों से नहीं मिलाना, लेने के देने पड़ सकते हैं | हाँ यदि आपका विचार आर्जेन्टिना वाले की बेटी से शादी करने का है तो केहुनी से केहुनी जरुर मिला सकते हैं | वैसे हमारे पास केहुनी मिलन या हाथ मिलाने का एक सुन्दर और अजमाया हुआ विकल्प है - अपने दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम, नमस्कार या नमस्ते कहने का | कुछ अमेरिकन अब लोगों का अभिवादन नमस्ते की मुद्रा मैं भी कर रहे हैं |


पर imported thought (आयातित विचार) प्रेमी भारत मैं, किसी देशी विचार या हाव-भाव या हाथ जोड़ कर प्रणाम/नमस्ते को तरजीह देने की संभावना क्षीण ही लगती है | फिर भी ये एक अच्छा मौका है .....

Monday, September 21, 2009

सेकुलर भटनागर - श्री राम द्वापर युग (त्रेता नहीं) मैं अवतार लिए थे !!!



भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत पुष्कर भटनागर ने अमेरिका से 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' साफ्टवेयर के सहारे रामायण काल की सूर्य/ चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों की स्थिति तथा खगोलीय पद्धति से भगवान् राम की जन्म तिथि (आधुनिक अंग्रेजी कैलेण्डर) 5114 ई.पू. निकाली है | तो भटनागर जी साफ्टवेयर के सहारे कह रहे हैं की भगवान् राम का जन्म द्वापर मैं हुआ था त्रेता मैं नहीं, क्योंकि 5114 ई.पू. तो द्वापर युग ही चल रहा था | लगभग सभी वैदिक विद्वान् उनके द्बारा दिए गए तिथि को गलत साबित किया है | आईये देखते हैं कैसे :
* वही रामायण (जिसपे भटनागर जी की गणना आधारित है) कहती है भगवन राम त्रेता युग मैं आये थे | कलि युग मैं ४,३२,००० (४ लाख ३२ हज़ार वर्ष), द्वापर मैं ८,६४,००० (८ लाख ६४ हज़ार) और त्रेता युग मैं १७,२८,००० (१७ लाख २८ हज़ार ) वर्ष हैं | reference :


http://www.encyclopediaofauthentichinduism.org/images/articles/devanagari/51.3.gif
http://www.encyclopediaofauthentichinduism.org/articles/51_the_bhartiya_chronology.htm
त्रेता युग, कलि और द्वापर के पहले था | तो भगवन राम का जन्म कलियुग के अबतक बीते वर्षों ५१०० + द्वापर युग के ८,६४,००० = ८, ६९, १०० (८ लाख ५९ हज़ार कम से कम ) तो अवश्य ही होगे | इसमें तो कोई दो राय होनी ही नहीं चाहिए | ये तो यहीं सिद्ध हो गया की भगवन का जन्म 5114 ई.पू. गलत है |
हिन्दुओं के सारे ग्रन्थ कलि युग मैं ४ लाख ३२ हज़ार, द्वापर मैं ८ लाख ६४ हज़ार और त्रेता युग मैं १७ लाख २८ हज़ार वर्ष ही बताते हैं | और लगभग सभी पुराण, महाभारत और अन्य ग्रन्थ स्पस्ट रूप से कहता है - भगवान् राम का जन्म लगभग १८ लाख वर्ष पूर्व हुआ था | जब सारे ग्रन्थ ये कह रहा है की राम का जन्म लगभग १८ लाख वर्ष पूर्व हुआ तो भटनागर साहब को मानने मैं क्या तकलीफ है? ये तो वही बात हुई की सारे ग्रंथों को नहीं मानता पर उसी ग्रन्थ से २-४ श्लोक निकाल के मैं अपने ढंग से अपनी कल्पना और अनुमान से गलत तिथि निकालूँगा | जब पुरे ग्रन्थ को नहीं मानते तो उसी ग्रन्थ से ग्रहों की स्थिति लेने की क्या आवश्यकता?
* 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' साफ्टवेयर को इतिहास के ग्रहों की स्थिति के लिए तैयार किया ही नहीं गया है | इतिहास मैं वर्णित ग्रहों , नक्षत्रों की स्थिति के आधार पे कोई निश्चित तिथि निकालने के लिए Archeoastronomy (as just like archeology it can help date events as described in literature. Also, it touches on ancient calendar systems, concepts of time and space, mathematics especially counting systems and geometry, navigation, and architecture.) का सहारा लिया जाता है | जब 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' साफ्टवेयर Archeoastronomy पे आधारित ही नहीं है तो ये इतिहास की सही सही तिथि कैसे बता सकती है ?
मुझे लगता है पुष्कर भटनागर ने भगवान् राम का गलत जन्म तिथि निकाल कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश की है | लगता है पुष्कर भटनागर जी पूरी रामायण पढ़े बिना ही चल दिए भगवान् राम की जन्म तिथि निकालने |
NOTE: हमारे कुछ हिन्दू ब्लॉगर बंधू जाने अनजाने भटनागर जैसे लोगों का समर्थन कर देते हैं | हिन्दू ब्लॉगर बंधुओं से मेरा नम्र निवेदन है की वैदिक सभ्यता पर लिखने से पहले वैदिक सभ्यता की कुछ प्रमाणिक पुस्तक उठा कर जांच लें की आप जो लिखने जा रहे हैं वो सही है या नहीं |

Wednesday, September 16, 2009

अश्लील भित्तिचित्र और मूर्तियाँ मंदिर मैं क्यूँ? Why sexual statue or carvings in Hindu Temple?

इस विषय पे 2 दिनों पहले एक पोस्ट किया था, कई टिप्पणियों मैं महत्वपुर्ण तथ्य और प्रश्न थे जिसकी चर्चा पिछली पोस्ट मैं नहीं की गई थी | फिर रंजना दि (संवेदना संसार) ने - आलेख और प्रत्युत्तर में की गयी टिपण्णी को मिलकर एक पूरी पोस्ट करने का सुझाव दिया | और ये पोस्ट आपके सामने है | कुछ और भी छोटी-मोटी सुधार किया है| आपकी प्रतिक्रिया और सुझव से हमें अवश्य अवगत कराएं |
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हमारे कई मंदिरों मैं अश्लील मूर्तियाँ  और भित्तिचित्र मंदिर के प्रवेश द्वार या बाहरी दीवारों पर अंकित होती हैं | तिरुपति में भी बिलकुल मुख्य द्वार के ऊपर ही मिथुन भाव की अंकित मूर्ती देखा तो सहज ही ये प्रश्न दिमाग मैं आया - आखिर हमारे देवालयों मैं अश्लील मूर्तियाँ भित्तिचित्र क्यों होते हैं? इधर-उधर बहुत खोजा पर इसका वास्तविक उत्तर मिला महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र में | बाजार में उपलब्ध कामसूत्र की लगभग सभी पुस्तक ६४ आसनों और चित्रों पर ही केन्द्रित होती हैं | और ज्यादातर पाठक कामसूत्र को ६४ आसनों और चित्रों के लिए ही तो खरीदता है | पर उन पुस्तकों में कामसूत्र का वास्तविक तत्व गायब रहता है | महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र के श्लोक थोड़े क्लिष्ट हैं, सरलीकरण हेतु कई भारतीय विद्वानों ने इसपे टीका लिखी | पर सबसे प्रमाणिक टीका का सौभाग्य प्राप्त हुआ मंगला टिका को | और इस हिंदी पुस्तक में लेखक ने मंगला टिका के आधार पर व्याख्या की है | लेखक ने और भी अन्य विद्वानों की टीकाओं का भी सुन्दर समावेश किया है इस पुस्तक में | 

एक गृहस्थ के जीवन में संपूर्ण तृप्ति के बाद ही मोक्ष की कामना उत्पन्न होती है | संपूर्ण तृप्ति और उसके बाद मोक्ष, यही दो हमारे जीवन के लक्ष्य के सोपान हैं | कोणार्क, पूरी, खजुराहो, तिरुपति आदि के देवालयों मैं मिथुन मूर्तियों का अंकन मानव जीवन के लक्ष्य का प्रथम सोपान है | इसलिए इसे मंदिर के बहिर्द्वार पर ही अंकित/प्रतिष्ठित किया जाता है | द्वितीय सोपान मोक्ष की प्रतिष्ठा देव प्रतिमा के रूप मैं मंदिर के अंतर भाग मैं की जाती है | प्रवेश द्वार और देव प्रतिमा के मध्य जगमोहन बना रहता है, ये मोक्ष की छाया प्रतिक है | मंदिर के बाहरी द्वार या दीवारों पर उत्कीर्ण इन्द्रिय रस युक्त मिथुन मूर्तियाँ और भित्तिचित्र देव दर्शनार्थी को आनंद की अनुभूतियों को आत्मसात कर जीवन की प्रथम सीढ़ी - काम तृप्ति - को पार करने का संकेत कराती है | ये मिथुन मूर्तियाँ दर्शनार्थी को ये स्मरण कराती है की जिस व्यक्ती ने जीवन के इस प्रथम सोपान ( काम तृप्ति ) को पार नहीं किया है, वो देव दर्शन - मोक्ष के द्वितीय सोपान पर पैर रखने का अधिकारी नहीं | दुसरे शब्दों मैं कहें तो देवालयों मैं मिथुन मूर्तियाँ मंदिर मैं प्रवेश करने से पहले दर्शनार्थीयों से एक प्रश्न पूछती हैं - "क्या तुमने काम पे विजय पा लिया?" उत्तर यदि नहीं है, तो तुम सामने रखे मोक्ष ( देव प्रतिमा ) को पाने के अधिकारी नहीं हो | ये गृहस्थ को एक और अत्यावश्यक कर्तव्य कि ओर ध्यान आकर्षित कराती है - मोक्षप्राप्ति के प्रयास करने के पूर्व वंशवृद्धि का कर्तव्य | ये मिथुन मूर्तियाँ दर्शनार्थीयों को काम को लक्ष्य ना मानने की सलाह दे कर वास्तविक लक्ष्य मोक्ष (देव प्रतिमा) प्राप्ति की ओर इशारा भी करती है |
एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है - ब्रह्मचारियों, ऋषियों, साधु-संतों के लिए इससे क्या जवाब निकलेगा? ब्रह्मचारियों, ऋषियों, साधु-संतों से भी अश्लील मूर्तियाँ और भित्तिचित्र यही सवाल करती है - अश्लील मूर्तियाँ देखकर भी तुम्हारा ध्यान आध्यात्म और इश्वर मैं ही लगा है ना ? योग-साधना, भक्ती, वैराग्य आदि से तुमने काम पे विजय प्राप्त किया है या नहीं ? यदि नहीं तो तुम भी मोक्ष के अधिकारी नहीं हो | 
इस प्रकार ये मिथुन मूर्तियाँ मनुष्य को हमेशा इश्वर या मोक्ष को प्राप्ति के लिए काम से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है | अश्लील भावों की मूर्तियाँ भौतिक सुख, भौतिक कुंठाओं और घिर्णास्पद अश्लील वातावरण (काम) मैं भी आशायुक्त आनंदमय लक्ष्य (मोक्ष) प्रस्तुत करती है | भारतीय कला का यह उद्देश्य समस्त विश्व के कला आदर्शों , उद्देश्यों एवं व्याख्या मानदंड से भिन्न और मौलिक है | 

प्रश्न किया जा सकता है की मिथुन चित्र जैसे अश्लील , अशिव तत्वों के स्थान पर अन्य प्रतिक प्रस्तुत किये जा सकते थे/हैं ? - ये समझना नितांत भ्रम है की मिथुन मूर्तियाँ , मान्मथ भाव अशिव परक हैं | वस्तुतः शिवम् और सत्यम की साधना के ये सर्वोताम माध्यम हैं | हमारी संस्कृति और हमारा वाड्मय इसे परम तत्व मान कर इसकी साधना के लिए युग-युगांतर से हमें प्रेरित करता आ रहा है – 

मैथुनंग परमं तत्वं सृष्टी स्थित्यंत कारणम् 
मैथुनात जायते सिद्धिब्रर्हज्ञानं सदुर्लभम | 

देव मंदिरों के कमनीय कला प्रस्तरों मैं हम एक ओर जीवन की सच्ची व्याख्या और उच्च कोटि की कला का निर्देशन तो दूसरी ओर पुरुष प्रकृति के मिलन की आध्यात्मिक व्याख्या पाते हैं | इन कला मूर्तियों मैं हमारे जीवन की व्याख्या शिवम् है , कला की कमनीय अभिव्यक्ती सुन्दरम है , रस्यमय मान्मथ भाव सत्यम है | इन्ही भावों को दृष्टिगत रखते हुए महर्षि वात्सयायन मैथुन क्रिया, मान्मथ क्रिया या आसन ना कह कर इसे 'योग' कहा है |